प्राचीनकाल की ग्रामीण और शहरी संरचनाएँ स्थिरता और परिवर्तन का परिणाम थीं। इनमें भौगोलिक स्थिति, संसाधन प्रबंधन और सामाजिक ढाँचे की विशेष भूमिका थी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थलाकृति का विशेष उपयोग हुआ, जिससे कृषि- आधारित जीवन शैली का विकास हुआ। ग्राम-निर्माण में आवास और कृषि भूमि का समुचित बंटवारा आवश्यक था। जल संचयन, सिंचाई और भूमि सुधार जैसे संसाधन प्रबंधन के तत्व ग्राम जीवन को सुनिश्चित करते थे। सामाजिक ढांचे में जाति प्रथा, पूर्वज पूजा और सामुदायिक कर्मकांडों ने स्थिरता को बढ़ाया। वहीं, शहरी संरचना में योजनाबद्ध बसावट और आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं, जैसे व्यापारिक केंद्रों का विकास। प्रशासनिक निकाय और नागरिक संस्थाएँ सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को संचालित करती थीं। ग्रामीण और शहरी संरचनाओं के बीच संपर्क और पलायन ने द्वंद्व को जन्म दिया, जिससे आदान-प्रदान और चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि दोनों संरचनाएँ अपनी विशेषताओं के अनुसार विकसित हुईं। इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि प्राचीनकाल की ये संरचनाएँ सामाजिक परिवर्तन और स्थिरता का संकेत देती हैं।
ग्रामीण और शहरी संरचनाएँ, प्राचीनकाल, सामाजिक- संस्थागत संबंध.
1. चट्टोपाध्याय, डी. पी. (2010) प्राचीन भारत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
अभिलेख प्राचीन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। अभिलेखन के लिए प्रस्तर के बाद ताम्रपत्र सर्वाधिक लोकप्रिय व प्रचलित वस्तु थी, जिसका निर्माण तथा उपयोग मुख्य रूप से दानात्मक अभिलेखों के लिए किया जाता था। अभिलेखन के कार्य में लिपिकार, लेखक, लिपिक, दिविर, करणिक, कायस्थ आदि के रूप में लेखकों का व्यवसायिक वर्ग संलग्न था। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी भी प्रारूप निर्माण के कार्य में न्यूनाधिक रूप से संलग्न रहा करते थे। इनमें सन्धिविग्रहिक महत्वपूर्ण था, जिसे स्मृतिकारों ने लेखक कहा है। वस्तुतः युद्ध व शान्ति का प्रमुख होता था किन्तु लेखक के रूप में उसका प्रमुख कार्य दानपत्रों का प्रारूप निर्मित करना था। इस दृष्टि से जहां प्राचीन साहित्यकारोें ने इसकी लेखन सम्बन्धी योग्यता का विशद वर्णन किया है, वहीं भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त होने वाले दानपत्रों में इसका लेखक के रूप में उल्लेख सन्धिविग्रहिक की लेखकीय गुण तथा दायित्व को स्पष्टतः पुष्ट करता है। प्रस्तुत शोधपत्र में इसी अल्पज्ञात पक्ष पर प्रकाश डालतें हुए सन्धिविग्रहिक की दानपत्र लेखक के रुप में भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
सन्धिविग्रहिक, अमात्य, स्मृति, राजलेखक, दानपत्र, लिपि, प्रशासन, अभिलेख.
1. गेरोला, वाचस्पति (सम्पादक) (2013) कौटिलीय अर्थशास्त्र, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, पृ. 19।
भारत का हृदयस्थली मध्य-पूर्वी राज्य-छत्तीसगढ़, अपनी ग्राम्य संस्कृति, लोकजीवन और लोकसंस्कार के कारण पहचानी जाती हैं। भारत गणराज्य के समान छत्तीसगढ़ भी ग्रामों का प्रदेश है। विभिन्न देशों, प्रदेशों के अपने संस्कार होते हैं, जिनसे उन राज्य की पहचान होती है। छत्तीसगढ़िया ग्राम्यजनों के भी अपने संस्कार हैं जो भौतिक-सांस्कृतिक रूप में विद्यमान है। ग्राम्य-संस्कार व्यक्तिगत जीवन को दिशा देने के साथ ही सामुदायिक एकता, लोक-आस्था और सामाजिक समरसता के भी प्रतीक हैं। कालखंड के साथ-साथ स्थिति-परिस्थिति और सामाजिक दशा बदलती है, फिर भी छत्तीसगढ़ का ग्राम्य जीवन अपनी संस्कारों को लिये अग्रसित है। इन्ही का अध्ययन छत्तीसगढ़ के ‘ग्राम्य-संस्कार’ में है।
छत्तीसगढ़िया, ग्राम्य-जीवन, लोकगीत, संस्कार.
1. जनगणना 2001, अनंतिम आँकड़ेः एक दृष्टि, 05।
प्रस्तुत शोध “डिजिटल युग में भाषा और साहित्य रू एक अध्ययन” हिंदी भाषा और साहित्य पर डिजिटल प्रौद्योगिकी के प्रभावों का समग्र विश्लेषण करता है। सूचना एवं संचार तकनीक के तीव्र विकास ने हिंदी भाषा के स्वरूप, संरचना और प्रयोग में महत्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। भाषा के सरलीकरण, हिंग्लिश के बढ़ते प्रभाव तथा नई तकनीकी शब्दावली के समावेश ने हिंदी को अधिक लचीला और गतिशील बनाया है, किन्तु इसके साथ भाषा की शुद्धता और व्याकरणिक अनुशासन पर भी प्रश्न उठे हैं। डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य के प्रसार को व्यापक बनाते हुए ई-पुस्तकों, ब्लॉग, सोशल मीडिया और ऑडियो माध्यमों के रूप में नए साहित्यिक आयाम विकसित किए हैं। इससे साहित्य का लोकतंत्रीकरण हुआ है और नए रचनाकारों को मंच प्राप्त हुआ है। वहीं, सतही लेखन, मौलिकता का संकट और कॉपीराइट उल्लंघन जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। यह शोध डिजिटल युग के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों का संतुलित मूल्यांकन करते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि हिंदी भाषा और साहित्य के समुचित विकास के लिए तकनीकी प्रगति और साहित्यिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।
डिजिटल युग, हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य, सोशल मीडिया, भाषा परिवर्तन.
1. मिश्र, आर. (2018) हिंदी भाषा और डिजिटल माध्यम. वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
The National Education Policy 2020 (NEP 2020) marks a transformative shift in India’s educational framework by emphasizing the integration of technology-driven pedagogical approaches, particularly online and blended learning models. This paper examines the theoretical underpinnings, institutional readiness, and practical challenges associated with the implementation of these models across diverse educational settings in India. Drawing upon a synthesis of empirical studies, policy documents, and comparative international frameworks, the study explores how digital infrastructure, educator competency, learner engagement, and socio-economic factors influence the effective adoption of hybrid learning environments. The findings suggest that while NEP 2020 provides a forward-looking vision, systemic barriers related to digital equity, teacher training, and institutional governance continue to impede large-scale implementation. The paper concludes by recommending evidence-based strategies for bridging the gap between policy intent and ground-level practice, emphasizing collaborative stakeholder engagement, adaptive curriculum design, and sustained investment in educational technology.
Nep 2020, Blended Learning, Online Education, Digital Pedagogy, Educational Technology, Higher Education Reform.
1. All India Survey on Higher Education. (2022) AISHE report 2021–22. Ministry of Education, Government of India. https://aishe.gov.in, Accessed on 12/02/2026.
राजनीतिक प्रचार किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सूचित करने, उम्मीदवारों के विचार और कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। हालांकि, राजनीतिक प्रचार के दौरान अक्सर ऐसा देखा जाता है कि उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वियों के बारे में तथ्यात्मक रूप से गलत जानकारी फैलाते हैं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचता है। इसे राजनीतिक मानहानि कहा जाता है। मानहानि एक ऐसा कानूनी अपराध है जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत इज्जत को अपमानजनक या झूठी बातों के माध्यम से क्षति पहुँचाई जाती है। राजनीतिक प्रचार में मानहानि न केवल व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन का मामला है, बल्कि यह लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन को भी प्रभावित करता है। भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 मानहानि से संबंधित अपराधों को परिभाषित करती है। इसके अनुसार, किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठे या अपमानजनक बयान देना अपराध है और इसके लिए कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। इसके अलावा, नागरिक कानून के तहत भी पीड़ित व्यक्ति हर्जाना और मुआवजा प्राप्त कर सकता है। राजनीतिक प्रचार में मानहानि के कानूनी उपाय और उनकी सीमाएँ एक जटिल विषय हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19(1)(a) भारतीय संविधान) और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक प्रचार में मानहानि केवल व्यक्तिगत विवाद का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता सीमित है क्योंकि राजनीतिक माहौल और मीडिया की भूमिका विवादों को बढ़ा देती है।
राजनीतिक प्रचार, मानहानि, कानूनी उपाय, भारतीय दंड संहिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र.
1. अग्रवाल, एच. ओ. (2020) भारतीय दण्ड संहिता. सेंट्रल लॉ पब्लिकेशन, इलाहाबाद।
जल प्रदूषण वर्तमान समय में वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। इसके परिणाम केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह कृषि क्षेत्र, पर्यावरणीय संतुलन, जीव-जंतु, और सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों पर गहरा प्रभाव डालता है। जल स्रोतों का दूषित होना फसलों की पैदावार, मिट्टी की उर्वरता और किसान की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है। उद्योगों, शहरी और औद्योगिक अपशिष्ट, कीटनाशक और रसायनों का अत्यधिक उपयोग, जल प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। कृषि पर जल प्रदूषण के प्रभाव के मामले में अपकृत दायित्व का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सिद्धांत न्यायिक दृष्टिकोण से प्रदूषक को जिम्मेदार ठहराने और प्रभावित पक्ष को न्याय सुनिश्चित करने के लिए अपनाया जाता है। अपकृत दायित्व का मूल विचार यह है कि अगर किसी व्यक्ति या संगठन की गतिविधियों से जल प्रदूषण हुआ और इससे कृषि को नुकसान पहुँचा, तो प्रदूषक को दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता। यह दृष्टिकोण Rylands vs Fletcher (1868) के अंतरराष्ट्रीय मानक और भारतीय न्यायालयिक निर्णयों में विकसित हुआ। इस शोध में जल प्रदूषण और कृषि पर उसके प्रभाव के विभिन्न आयामों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि जल प्रदूषण के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी, फसलों की पैदावार में गिरावट, जल-जीव और जैविक विविधता में हानि, और किसानों की आर्थिक स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अपकृत दायित्व के कानूनी उपाय किसानों को न्याय दिलाने और प्रदूषण को रोकने के लिए प्रभावी साधन साबित हुए हैं साथ ही, अध्ययन में यह पाया गया कि भारत में पर्यावरणीय कानून जैसे कि जल (Prevention and Control of Pollution) Act 1974 और Environmental Protection Act 1986 अपकृत दायित्व के सिद्धांत को मान्यता देते हैं और प्रदूषण के मामलों में न्यायालयिक निगरानी सुनिश्चित करते हैं। न्यायालय ने कई मामलों में प्रदूषण करने वाले को दोषी ठहराते हुए प्रभावित पक्ष को मुआवजा प्रदान किया। यह शोध केवल कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि जल प्रदूषण के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का विश्लेषण भी प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन प्रदूषण नियंत्रण, नीति निर्धारण और किसानों की सुरक्षा के लिए नीतिगत सुझाव भी प्रदान करता है। निष्कर्ष के अनुसार, जल प्रदूषण और कृषि नुकसान को नियंत्रित करने के लिए अपकृत दायित्व एक प्रभावी कानूनी साधन है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकारी नीतियों, न्यायिक हस्तक्षेप और सामाजिक जागरूकता आवश्यक है।
जल प्रदूषण, कृषि, अपकृत दायित्व, पर्यावरणीय कानून, औद्योगिक अपशिष्ट, सख्त दायित्व.
1. अग्रवाल, एच. ओ. (2018) पर्यावरण संरक्षण एवं विधि. सेंट्रल लॉ पब्लिकेशन, इलाहाबाद।
पर्यावरण प्रदूषण समकालीन समाज की सबसे गंभीर चिंताओं में से एक बन गया है, जो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बल्कि व्यक्तिगत अधिकारों और कल्याण को भी प्रभावित करता है। यह अध्ययन निजी उपद्रव की अवधारणा के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण की जांच करता है, जो एक कानूनी सिद्धांत है जिसका उपयोग पारंपरिक रूप से किसी व्यक्ति के संपत्ति के शांतिपूर्ण उपयोग के अधिकार की रक्षा के लिए किया जाता है। यह शोध गुणात्मक और सैद्धांतिक विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें कानूनी सिद्धांतों, विद्वानों की व्याख्याओं और द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि प्रदूषण चाहे वह वायु, जल या ध्वनि के रूप में हो अक्सर व्यक्तियों को प्रत्यक्ष और महत्वपूर्ण हानि पहुंचाता है, इस प्रकार यह निजी उपद्रव के दायरे में आता है। निष्कर्ष बताते हैं कि प्रदूषण को निजी उपद्रव के रूप में मान्यता देने से व्यक्तिगत उपचारों को मजबूत किया जा सकता है और जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है, हालांकि जागरूकता की कमी और प्रक्रियात्मक सीमाओं जैसी चुनौतियां महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य यह जांचना है कि क्या पर्यावरणीय प्रदूषण को कानूनी ढांचे के भीतर निजी उपद्रव के रूप में व्याख्यायित और संबोधित किया जा सकता है। यह इस बात को समझने पर केंद्रित है कि प्रदूषण किस प्रकार व्यक्तिगत अधिकारों, विशेष रूप से स्वास्थ्य, संपत्ति और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। यह शोध गुणात्मक पद्धतियों पर आधारित है, जिसमें सैद्धांतिक कानूनी विश्लेषण और केस कानूनों, अधिनियमों और विद्वतापूर्ण साहित्य की समीक्षा शामिल है। पत्रिकाओं, कानूनी टिप्पणियों और रिपोर्टों जैसे द्वितीयक डेटा स्रोतों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से पता चलता है कि पर्यावरण प्रदूषण अक्सर व्यक्तियों को प्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाता है, इसलिए इसे निजी उपद्रव कानून के अंतर्गत संबोधित करना उचित है। हालाँकि, प्रवर्तन और कानूनी जागरूकता की कमियाँ इसकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। कानूनी तंत्र को मजबूत करने से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।
पर्यावरण प्रदूषण, समाज, कानून.
1. Atiyah, P.S. (1967) Vicarious Liability in the Law of Torts, Butterworths, New Delhi.
यह अध्ययन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका का विश्लेषण करता है। शीत युद्ध के पश्चात स्थापित एकध्रुवीय व्यवस्था में अमेरिका का प्रभुत्व रहा, किंतु 2008 के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन में परिवर्तन हुआ और उभरती व्यवस्थाओं विशेष रूप से भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। यह शोध भारत की विदेश नीति में आए परिवर्तनों जैसे- रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण का परीक्षण करता है। साथ ही G20, BRICS, QUAD और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों में भारत की सक्रिय भागीदारी का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन यह भी दर्शाता है, कि आर्थिक कूटनीति, सामरिक क्षमता और सॉफ्ट पावर उसे वैश्विक स्तर पर एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है। हालांकि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, वैश्विक संस्थानों में सीमित प्रतिनिधित्व और आंतरिक आर्थिक चुनौतियां इसके सामने प्रमुख बाधा हैं। अतः बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत एक उभरती हुई और संतुलनकारी शक्ति के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा भविष्य में वैश्विक व्यवस्था को आकार देने की क्षमता रखता है।
बहुध्रुवीय व्यवस्था, भारत की विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-संरेखण, सॉफ्ट पावर, आर्थिक कूटनीति.
1. Ikenberry, G. J. (2011) Liberal Leviathan:The Origin Crisis and Transformation of the American World Order. Princeton University Press. Princeton, NJ, p. 56-78.
बाल यौन अपराध एक गंभीर सामाजिक समस्या है जो बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित करती है। यह अपराध न केवल व्यक्तिगत पीड़ा उत्पन्न करता है, बल्कि समाज और परिवार की संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालता है। बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है, विशेष रूप से शहरी और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव के कारण। इन अपराधों में बलात्कार, यौन उत्पीड़न, पोर्नाेग्राफी का उपयोग और बालकों के शोषण के अन्य रूप शामिल हैं। भारत में बालकों की सुरक्षा और यौन अपराधों के नियंत्रण के लिए कई कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं। प्रमुख कानूनों में पॉक्सो एक्ट, भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराएँ और न्यायालयिक निर्णय शामिल हैं। यह कानून न केवल अपराधियों को दंडित करता है, बल्कि पीड़ित बालकों की सुरक्षा, गोपनीयता और पुनर्वास की भी गारंटी देता है। इस अध्ययन का उद्देश्य बालकों के विरुद्ध यौन अपराधों की प्रकृति, उनके कारण, प्रभाव और कानूनी सुरक्षा उपायों का विश्लेषण करना है। शोध में प्राथमिक डेटा के रूप में बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध के मामलों के आंकड़े, पुलिस रिपोर्ट और विशेषज्ञ इंटरव्यू शामिल हैं। द्वितीयक डेटा में संबंधित कानून, न्यायालयिक निर्णय, सरकारी रिपोर्ट और शोध पत्र शामिल हैं। अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि कानूनी उपाय प्रभावी हैं, लेकिन समाज में जागरूकता और पुलिस प्रशासन की सक्रियता अपराधों को रोकने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बालकों की सुरक्षा के लिए स्कूलों, परिवार और समाज में शिक्षा, जागरूकता अभियान और कड़े कानूनी उपायों की आवश्यकता है।
बाल यौन अपराध, पॉक्सो एक्ट 2012, बच्चों का संरक्षण, यौन उत्पीड़न, कानूनी प्रावधान, सामाजिक जागरूकता.
1. आचार्य, पी.एस. (2023) भारतीय न्याय संहिताः सिद्धांत और व्याख्या. सेंट्रल लॉ पब्लिकेशन्स, प्रयागराज।
साइबर अपराध आज की डिजिटल दुनिया में एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन गया है। इंटरनेट, मोबाइल तकनीक, डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण साइबर अपराध के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत में साइबर अपराध की प्रकृति में वित्तीय धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, डेटा उल्लंघन, ऑनलाइन हैकिंग, साइबर धमकी, सोशल मीडिया अपराध और ऑनलाइन व्यापार से संबंधित अपराध शामिल हैं। साइबर अपराध केवल व्यक्तिगत और वित्तीय नुकसान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य साइबर अपराध की प्रकृति, कारण और इसके समाधान के लिए लागू विधिक प्रावधानों का विश्लेषण करना है। अध्ययन में विशेष रूप से छत्तीसगढ़ राज्य के डिजिटल और साइबर अपराध की स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया गया है। भारत में साइबर अपराध से संबंधित प्रमुख कानूनी प्रावधान Information Technology Act, 2000, भारतीय दंड संहिता की साइबर संबंधित धाराएँ, और न्यायालयिक निर्णय हैं। ये प्रावधान साइबर अपराध को रोकने, डिजिटल पहचान की सुरक्षा, डेटा संरक्षण और दोषियों को दंडित करने के लिए प्रभावी साधन हैं। इसके अतिरिक्त, National Cyber Crime Reporting Portal और राज्य स्तरीय साइबर सुरक्षा सेल्स ने साइबर अपराध की रिपोर्टिंग, निगरानी और रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। छत्तीसगढ़ राज्य में साइबर अपराध की घटनाओं में वृद्धि हुई है। डिजिटल सेवाओं, ऑनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के कारण साइबर अपराध की संख्या में वृद्धि हुई है। सरकारी प्रयास, जैसे जागरूकता अभियान, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और साइबर अपराध शाखाओं की स्थापना, इस समस्या के समाधान में मदद कर रहे हैं। इस शोध का उद्देश्य भारत में बढ़ते साइबर अपराधों की समस्या का विश्लेषण करना, उनसे संबंधित विधिक प्रावधानों का अध्ययन करना तथा विशेष रूप से छत्तीसगढ़ राज्य में इन अपराधों की स्थिति एवं नियंत्रण उपायों का मूल्यांकन करना है। इस अध्ययन में प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ो का उपयोग किया गया है। प्राथमिक आंकड़े हेतु 120 उत्तरदाताओं (विद्यार्थी, पुलिस अधिकारी एवं सामान्य नागरिक) से प्रश्नावली एवं साक्षात्कार के माध्यम से जानकारी एकत्र की गई। द्वितीयक आंकड़े विभिन्न रिपोर्टों, कानूनों, शोध पत्रों एवं सरकारी दस्तावेजों से लिया गया। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और कानून होने के बावजूद इनके नियंत्रण में कई चुनौतियां हैं। जागरूकता की कमी, तकनीकी ज्ञान का अभाव एवं कानून के धीमे क्रियान्वयन प्रमुख समस्याएं हैं।
साइबर अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, साइबर सुरक्षा, डेटा उल्लंघन, साइबर कानून, समाजिक जागरूकता.
1. Bakshi, P. M. (2025) Information Technology Act, 2000. Universal Law Publishing, Delhi.
भारत में कैदियों के विधिक अधिकार मानवाधिकारों और न्यायिक प्रणाली के मूल सिद्धांतों से गहराई से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति को कानून के तहत समानता और न्याय का अधिकार प्राप्त है, चाहे वह सामान्य नागरिक हो या किसी अपराध के संदेह में कैद हो। संविधान भारत में कैदियों के अधिकारों की रक्षा करता है, जैसे कि धारा 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, धारा 14 के तहत समानता का अधिकार और न्यायपालिका के विभिन्न निर्णय। कैदियों के अधिकार केवल उनके व्यक्तित्व की रक्षा के लिए नहीं हैं, बल्कि यह जेल प्रशासन में अनुशासन, सुधार और पुनर्वास के लिए भी आवश्यक हैं। इसमें शामिल हैं उचित भोजन, स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा और कानूनी सहायता। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों जैसे कि Universal Declaration of Human Rights (UDHR) और International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) भारत में लागू कानूनों में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यह शोध कैदियों के विधिक अधिकारों की स्थिति का अध्ययन करता है। इसमें यह विश्लेषण किया गया है कि कैदी अधिकारों का उल्लंघन किस प्रकार होता है, न्यायालय और मानवाधिकार संगठनों की भूमिका क्या है, और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से इन अधिकारों को कैसे सुरक्षित किया जा सकता है। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारों की जानकारी और उचित कार्यान्वयन न केवल कैदियों के जीवन स्तर को सुधारता है बल्कि समाज में न्याय की भावना और सुधारात्मक प्रणाली की विश्वसनीयता भी बढ़ाता है। भारत में जेल सुधार और कैदियों के अधिकारों के मामलों में न्यायालय ने कई बार सख्त निर्देश जारी किए हैं। उदाहरणस्वरूप, Hussainara Khatoon vs State of Bihar (1979) मामले में न्यायालय ने लंबित मामलों और जमानत के अधिकार को सुनिश्चित किया। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और विभिन्न राज्य मानवाधिकार संस्थाएं कैदियों के अधिकारों की सुरक्षा में सक्रिय हैं। इस शोध में यह पाया गया कि कई बार कैदियों के अधिकारों का उल्लंघन संसाधनों की कमी, प्रशासनिक अक्षम्यताओं और जागरूकता की कमी के कारण होता है। कानूनी उपाय, निगरानी और नीति सुधार इन अधिकारों की सुरक्षा में प्रभावी साधन हैं। न्यायालयिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक सुधार कैदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। अतः यह अध्ययन दर्शाता है कि कैदियों के विधिक अधिकार न केवल उनके मानवाधिकार की रक्षा करते हैं बल्कि जेल सुधार और समाज में न्याय सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उचित कानूनी उपाय, प्रशासनिक प्रयास और मानवाधिकार जागरूकता के माध्यम से कैदियों के अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य भारत में कैदियों के विधिक अधिकारों का विश्लेषण करना, उनके संवैधानिक संरक्षण का अध्ययन करना तथा जेल प्रणाली में इन अधिकारों के वास्तविक क्रियान्वयन की स्थिति का मूल्यांकन करना है। यह अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि कैदियों के अधिकार केवल सैद्धांतिक नहीं हैं, बल्कि मानवाधिकारों के अंतर्गत एक अनिवार्य आवश्यकता हैं। इस अध्ययन में प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ो का उपयोग किया गया है। प्राथमिक आंकड़ो के लिए 80 उत्तरदाताओं (पूर्व कैदी, अधिवक्ता, एवं सामाजिक कार्यकर्ता) से साक्षात्कार एवं प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी एकत्र की गई। द्वितीयक आंकड़ो में न्यायिक निर्णय, संविधान, विधिक लेख, रिपोर्ट एवं पुस्तकों का अध्ययन शामिल है। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि भारत में कैदियों के अधिकारों की संवैधानिक एवं न्यायिक मान्यता तो है, परंतु उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक बड़ी चुनौती है। जेलों में भीड़, संसाधनों की कमी, और प्रशासनिक उदासीनता प्रमुख समस्याएं हैं।
कैदियों के अधिकार, मानवाधिकार, जेल सुधार, कानूनी सहायता, न्यायपालिका, धारा 21 एवं 14.
1. चंदा, कुमकुम (1983) द इंडियन जेल. विकास प्रकाशन, नई दिल्ली।
The study evaluates the evolving role of green bonds in promoting sustainable development in India from 2015 to 2024. As industrialization accelerates and environmental challenges intensify, green bonds have emerged as innovative financial tools to channel investments into eco-friendly projects. This research employs a descriptive and analytical research design based exclusively on secondary data sourced from SEBI, the World Bank, and the Climate Bonds Initiative, the study finds that clean energy projects secured the largest share (45–65%) of funds, followed by sustainable transportation and green buildings. However, limited financing in water and waste management sectors remain underfunded. The findings reveal a strong alignment with Sustainable Development Goals (SDG 7: Affordable and Clean Energy and SDG 11: Sustainable Cities and Communities), though broader contributions to other SDGs remain underdeveloped. Overall, India; s green bond market has evolved into a vital component of sustainable finance, though challenges such as policy gaps, greenwashing risks and limited sectoral diversification still hinder its full potential.
Green Bonds, Climate Finance, Sustainable Development, Renewable Energy.
1. Abhilash; Shenoy, S. S.; Shetty, D. K.; Lobo, L. S. & Subrahmanya Kumar, N. (2023) Green bond as an innovative financial instrument in the Indian financial market: Insights from systematic literature review approach. SAGE Open, 13(2), 1-15, DOI:10.1177/21582440231 178783
Informed consent is a fundamental principle in medical law and ethics that ensures respect for patient autonomy while balancing the professional judgment of healthcare providers. It refers to the process through which a patient voluntarily agrees to a medical procedure after being adequately informed about its nature, risks, benefits, alternatives, and possible outcomes. In modern healthcare systems, informed consent has evolved from a mere formality into a critical component of patient-centered care. However, conflicts often arise between a patient’s right to make decisions about their own body and a doctor’s discretion to act in the patient’s best interest, especially in complex or emergency situations. The concept of informed consent is rooted in ethical principles such as autonomy, beneficence, non-maleficence, and justice. Patient autonomy emphasizes the right of individuals to make decisions regarding their own healthcare without coercion or undue influence. On the other hand, doctors are guided by professional ethics and clinical expertise, which sometimes lead them to make decisions that may override or influence patient choices. This tension between autonomy and professional discretion forms the core issue of this research. In India, the legal framework governing informed consent has been shaped by judicial decisions and guidelines rather than a single comprehensive statute. Courts have emphasized the importance of obtaining valid consent, particularly in cases involving invasive procedures or high-risk treatments. The landmark judgment in Samira Kohli v. Dr.PrabhaManchanda (2008) clarified the scope of informed consent, stating that patients must be informed about the nature and purpose of the procedure, its risks, and alternatives. However, the court also recognized certain exceptions, such as emergencies where obtaining consent may not be feasible. The primary objective of this study is to examine the concept of informed consent in medical practice and analyze the conflict between a patient’s right to autonomy and a doctor’s professional discretion. The study aims to evaluate whether current legal and ethical frameworks adequately protect patient rights while allowing doctors to exercise clinical judgment. This research adopts a doctrinal and analytical approach using secondary sources such as legal provisions, medical ethics guidelines, case laws, books, and journals. Additionally, empirical data collected from 50 respondents has been analyzed using both quantitative and qualitative methods. The study finds that informed consent is a fundamental patient right rooted in autonomy and dignity. However, in practice, doctors often exercise discretion due to emergencies, lack of patient awareness, or complexity of medical information. A balanced approach is required to ensure both patient rights and effective medical care.
Informed Consent, Patient Autonomy, Doctor’s Discretion, Medical Ethics, Healthcare Law, Patient Rights.
1. Bolam v. Friern Hospital Management Committee – Introduced doctor’s discretion (Bolam test).
In the rapidly evolving digital marketplace, businesses increasingly use subtle and subconscious techniques to influence consumer behavior. This paper explores how subliminal messaging is being used in digital marketing, especially in growing field of e-commerce, focusing on the balance between marketing innovation and ethical responsibility. The study adopts a descriptive and analytical approach, relying on secondary data sourced from academic journals, industry reports, and policy documents published between 2015 and 2024. A qualitative thematic analysis was conducted to explore key dimensions such as marketing opportunities, consumer perceptions, and ethical dilemmas. The findings suggest that subliminal cues ranging from visual and auditory signals to algorithmic personalization can improve brand recognition, consumers engagement, and emotional connection. However, a significant portion of consumers view such practices as manipulative and invasive, raising serious ethical and regulatory concerns. The findings underscore the need for transparent, consumer-centric digital marketing policies and the development of ethical guidelines to regulate subconscious influence in e-commerce. The study concludes that while subliminal messaging offers innovative opportunities for marketers, it also demands higher ethical standards and accountability to sustain consumer trust in the digital economy.
Subliminal Messaging, Digital Marketing, E-commerce, Consumer Behavior, Ethical Dilemmas.
1. Ahmad, Z. & Kathait, R. (2024) Consumer perception of subliminal advertising in digital marketing: Ethical concerns and opportunities. International Journal of Digital Marketing Studies, 12(3), 45–59.
दहेज प्रथा भारतीय समाज की एक गहरी जड़ें जमाए हुई सामाजिक कुरीति है, जो महिलाओं के शोषण, लैंगिक असमानता और सामाजिक अन्याय का प्रमुख कारण बनी हुई है। यह प्रथा विवाह को एक पवित्र संस्था के बजाय आर्थिक लेन-देन में परिवर्तित कर देती है। इस शोध पत्र में दहेज प्रथा के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी पहलुओं का आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दहेज प्रथा महिलाओं के प्रति हिंसा, घरेलू उत्पीड़न, दहेज हत्या और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देती है। इसके बावजूद, कानूनी प्रावधानों के होते हुए भी यह प्रथा समाज में व्याप्त है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य दहेज प्रथा को एक सामाजिक कुरीति के रूप में समझना, उसके सामाजिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विश्लेषण करना तथा वर्तमान भारतीय समाज में इसके बने रहने के कारणों की आलोचनात्मक समीक्षा करना है। इसके अतिरिक्त यह अध्ययन दहेज निषेध कानूनों की प्रभावशीलता का परीक्षण करता है। इस अध्ययन में प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के डेटा का उपयोग किया गया है। प्राथमिक डेटा हेतु 100 उत्तरदाताओं पर आधारित प्रश्नावली सर्वेक्षण किया गया, जबकि द्वितीयक डेटा पुस्तकों, शोध पत्रों, सरकारी रिपोर्टों एवं न्यायिक निर्णयों से संकलित किया गया। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दहेज प्रथा आज भी सामाजिक प्रतिष्ठा, पितृसत्तात्मक सोच एवं आर्थिक असमानता के कारण जीवित है। कानून होने के बावजूद इसका प्रभाव सीमित है। जागरूकता की कमी तथा सामाजिक दबाव इसके प्रमुख कारण हैं।
दहेज प्रथा, सामाजिक कुरीति, महिला उत्पीड़न, लैंगिक असमानता, दहेज निषेध अधिनियम, घरेलू हिंसा.
1. जैन, एस.के. (2014) दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम, तृतीय संस्करण, कमर्शियल लॉ पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।
साइबर क्राइम का मतलब है ऐसे क्रिमिनल जुर्म जो इंटरनेट या किसी दूसरे कंप्यूटर नेटवर्क का इस्तेमाल करके किए जाते हैं। साइबर क्राइम इंटरनेट और कंप्यूटर का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति की पहचान चुराने या गैर-कानूनी तरीके से प्रोग्राम इंपोर्ट करने या खराब प्रोग्राम को इंपोर्ट करने के लिए किए जाते हैं। आधुनिक समय मे साइबर क्राइम काफी हद तक बढ़ता जा रहा है, साइबर क्राइम हर व्यक्ति के लिए बहुत नुकसानदायक है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर उसके पर्सनल डेटा की चोरी शामिल होती है जिससे समाज में उसकी इज्ज़त को नुकसान पहुँच सकता है, साइबर क्राइम का हमारे समाज और इकॉनमी और बिज़नेस पर बहुत बुरा असर पड़ता है। यह पूरे विश्व में एक बहुत बड़ी समस्या है जो बहुत तेजी से बढ़ रही है। साइबर अपराध के विभिन्न रूप हमारे समाज को प्रभावित कर रहे हैं जिसका उदाहरण साइबर पोर्नाेग्राफी, साइबर आतंकवाद, साइबर बदमाशी, बच्चों का शोषण और बच्चों की तस्करी, साइबर उत्पीड़न, वित्तीय अपराध, ऑनलाइन जुआ, जालसाजी, साइबर मानहानि, साइबर स्टॉकिंग, ईमेल स्पूफिंग, ईमेल आदि हैं। ये अपराध न केवल किसी व्यक्ति को आर्थिक रूप से प्रभावित करते हैं बल्कि यह उस व्यक्ति को मानसिक रूप से भी प्रभावित करते हैं, जैसे महिलाओं की तस्वीरों को इंटरनेट पर साझा करके महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाना और यह आजकल किसी भी किशोर के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। यह विकास में बाधा डालता है, क्योंकि कई किशोर इस साइबर जाल में फंस जाते हैं और आत्महत्या या अन्य अवैध प्रकार के कृत्य करके अपना जीवन समाप्त कर रहे हैं।
साइबर, अपराध, हैकिंग, साइबर मानहानि, साइबर कानून, आई टी अधिनियम 2000.
1. सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) विधेयक, 2006।
Women with disabilities occupy a social position shaped by the simultaneous and interacting effects of gender inequality and disability-based exclusion. Although scholarly engagement with gender and disability has expanded over the past two decades, the development of this literature has been uneven across time, regions, and methodological approaches. This paper presents a chronological (year-wise) systematic literature review of peer-reviewed studies published between 2002 and 2022 to examine how academic understandings of women with disabilities have evolved. Using an intersectional and feminist disability studies framework, 45 articles were systematically identified from major academic databases and analyzed through temporal mapping rather than thematic aggregation. The review reveals a progression from early theoretical and conceptual debates to later empirical, policy-oriented, and rights-based scholarship. However, significant gaps persist, including delayed empirical engagement, limited longitudinal research, and the continued marginalization of women with disabilities’ own voices within knowledge production. By foregrounding time as an analytical dimension, this review demonstrates how scholarly attention itself reflects broader structures of marginalization and calls for temporally sensitive, participatory, and intersectionality-informed future research.
Intersectionality, Chronological Review, Women, Disabilities, Double Marginalization.
1. Collins, P. H. (2015) Intersectionality’s definitional dilemmas. Annual Review of Sociology, 41, 1–20.
This study examines the impact of investment decisions on women entrepreneurs in Raipur City, recognizing the increasing number of women entering entrepreneurship and the importance of understanding their financial decision-making processes. It investigates various factors influencing these decisions, including access to financial resources, risk attitudes, financial literacy, and cultural contexts. Through a combination of surveys and interviews with local women entrepreneurs, the study sheds light on the challenges they encounter, particularly related to funding constraints and societal expectations, this research delves into the investment behaviour of female entrepreneurs and the factors shaping their investment attitudes as emerging players in the market. It aims to gauge the changing perceptions and attitudes of women entrepreneurs in Raipur District, Chhattisgarh, regarding investment activities. Drawing upon primary data collected from 100 respondents, the study provides insights into entrepreneurs’ attitudes, perceptions, and investment decision-making processes. The findings reveal that different factors, including social considerations and individual behaviours are influenced women entrepreneurs’ investment decisions. Moreover, their risk tendencies and limited access to Government support contribute to their cautious approach to investment. These findings add to a better understanding of the investment psychology of female entrepreneurs and provide vital information for financial professionals to design investment plans accordingly. Furthermore, the research highlights the challenges faced by women entrepreneurs, such as financial constraints and societal pressures, despite their resilience and creativity. It emphasises the importance of improved support mechanisms from Government agencies and financial institutions to encourage the establishment of women-led businesses in Raipur City.
Investment Behaviour, Decision-making, Women Entrepreneurs, Raipur City.
1. Audretsch, D.; Belitski, M. & Cherkas, N. (2021) Entrepreneurial ecosystems in cities: the role of institutions. Plos One, 16(3), e0247609. https://doi.org/10.1371/journal.pone.024 7609
वर्तमान समय संचार की आधुनिकता में समाहित है। यह दौर सूचनाओं का है, जिसे तकनीकी तंत्र आधारित सोशल मीडिया ने और अधिक बल दिया है। इस तकनीकी क्रांति ने सूचना, शिक्षा, व्यापार और सामाजिक जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। तकनीकी तंत्र का ही यह देन है कि आज पूरी की पूरी एक आभासी दुनिया कायम हो गई है। व्यक्ति भौगोलिक सीमाओं जैसे बंधन को लगभग तोड़ चुका है। इस दौर में अभिव्यक्ति की आजादी को एक नया स्वरूप प्राप्त हुआ है। हालांकि, सोशल मीडिया के उपयोग की व्यापकता में विभिन्न तरह की खामियाँ भी देखने को मिलती रही हैं। इन्हीं खामियों की उपलब्धता ने अपराध के लिए अवसर प्रदान किया है। सोशल मीडिया पर मौजूद भ्रामक सूचनायें, साम्प्रदायिक सामग्री, अश्लीलता, साइबर उत्पीड़न तथा असत्यापित मनगढ़ंत सामग्री की भरमार ने न सिर्फ लोगों के बौद्धिक चेतना को खराब कर दिया है व व्यक्तियों में आपराधिक मनोवृति में भी बढ़ावा हुआ है।
अपराध, सोशल मीडिया, आधुनिकता, सूचना प्रौद्योगिकी, विधि व साइबर अपराध.
1. Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 (Act No. 45 of 2023).
मनुष्यों में जीवन यापन के सभी के अपने विविध व्यवसाय या रोजगार के साधन होते हैं। इसी के साथ ही कुछ लोगों में विशेष रुचियां भी होती हैं। किसी को संगीत, गायन, वादन, लेखन, खेल, मूर्तिकला, पठन-पाठन आदि में रुचि होती है। इसी तरह पेशे से वकील लतीफ घोंघी को व्यंग्य लेखन में विशेष रुचि थी। उनका इस विधा में महारथ के कारण उन्हें ‘‘व्यंग्य शिल्पी’’ की संज्ञा दी गई थी। उन दिनों उनकी पारिवारिक परिस्थिति अच्छी नहीं थी जिसके कारण वे उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज नहीं जा सके। आगे पढ़ने की प्रबल इच्छा के कारण स्वाध्यायी छात्र के रूप में उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखी। प्रायमरी स्कूल की नौकरी करते हुए उनके आगे पढ़ने के रास्ते खुलते गए। एक समय भोजन करके और मित्रों के पुराने कपड़े पहनकर भी वे अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। डॉक्टर बनने की उनकी दिली इच्छा पूरी नहीं हो पाई। अभाव और संघर्ष में दिन काटने के कारण उनके मन में शोषितों और पीड़ितों के लिए हमेशा सहानुभूति रही। 1961 से शुरू हुई उनकी हास्य-व्यंग्य लेखन की यात्रा आजीवन चलती रही। वे अपनी रचनाएं सीधे टाइपराइटर पर लिखते रहे। उनकी रचनाओं का मूल लक्ष्य अव्यवस्था, अनास्था, अनीति, अनाचार, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, बेईमानी, अन्याय आदि व्यवस्था विरोधी विसंगतियों पर प्रहार करना है जिसे उन्होंने हास्य के साथ कैप्सूल बनाकर रोचक रूप मंे प्रस्तुत किया है। वे कहते थे कि व्यंग्य एक प्रकार का शीशा है, जिसमें देखने वाले को अपने मुंह को छोड़कर प्रत्येक का मुंह दिखाई देता है। यही कारण है कि विश्व में व्यंग्य का स्वागत किय जाता है। व्यंग्यकार एक ऐसा सामाजिक व्यक्ति होता है, जिसका कार्य समक्ष पड़ी गंदगी को साफ करना होता है। वैसे तो व्यंग्य आक्रामक होता है, जो पाठक के मन पर चोट करता है। यह चोट व्यवस्था की, समाज की विद्रूपताओं और विसंगतियों की हो सकती है, आदमी के दोहरे व्यक्तित्व की हो सकती है या और किसी तरह की। बहरहाल आक्रामकता ही व्यंग्य की पहचान मानी गई है। वे फेंटेसी के माध्यम से व्यंग्य उभारने में प्रयत्नशील रहे। उनकी रचनाएं एक प्रसंग के पूर्ण प्रभाव के रूप में व्यंग्य करती हैं। एक संपूर्ण प्रसंग किसी चरित्र, वर्ग विशेष, घटना, समस्या विशेष की विसंगतियों को उभारता है और ये विसंगतियां ही व्यंग्य को जन्म देती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में कथातत्व प्रमुखता से विद्यमान है।
महारथ, शिल्पी, सहानुभूति, टाइपराइटर, विसंगतियों, विद्रूपताओं.
1. कमलेश, कृष्ण (1987) अमृत संदेश, 8 फरवरी 1987, पृ. 5।
प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य व्यक्तिगत भिन्नता चाहे वह किशोर छात्र या छात्राएं हो, या फिर शहरी एवं ग्रामीण परिवेश के आधार पर स्मार्ट फोन की लत को जानना है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के किशोर छात्र एवं छात्राओं के स्मार्ट फोन की लत में क्या अंतर है, अंतर क्यों है, ऐसे प्रश्नों का उत्तर प्रस्तुत अध्ययन द्वारा प्राप्त हो सकेगा। विद्यालयों के शिक्षकों एवं परिवार में अभिभावकों द्वारा विद्यार्थियों में स्मार्ट फोन की लत को नियंत्रित करना उनके व्यक्तित्व विकास एवं भावी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। अतः प्रस्तुत शोध में कक्षा 11वीं के ग्रामीण एवं शहरी किशोर छात्र एवं किशोर छात्राओं के स्मार्टफोन व्यसन को जानने के लिए डॉ. विजय श्री एवं मासौद अंसारी द्वारा निर्मित (प्रमाणीकृत) परीक्षण का प्रयोग किया गया है, सांख्यिकी गणना हेतु मध्यमान मानक विचलन तथा सार्थकता हेतु सीआर परीक्षण का प्रयोग किया गया है।
स्मार्ट फोन व्यसन, किशोर विद्यार्थी.
1. Cain, N. & Gradisar, M. (2010) Electronic media use and sleep in school-aged children and adolescents: A review. Sleep Medicine, 11(8), 735–742. https://doi.org/10.1016/j.sleep.2010.02.006
AI in the India‘s defence sector is revolutionizing military capabilities through enhanced situational awareness, autonomous systems (drones, vehicles, Lethal Autonomous Weapon Systems - LAWS), improved cyber defence, smarter logistics, and advanced predictive maintenance, enabling faster, data-driven decisions, better resource allocation, and reduced human risk in complex operations. Key applications include AI-powered ISR (Intelligence, Surveillance, Reconnaissance), autonomous border patrols, target recognition, and AI-driven command support systems for superior battlefield insights.1
ISR, LLMs, DAIC, Artificial Intelligence, C2ISR, Defence.
1. https://www.google.com/search?q=ai+in+defence, Assessed on 06/09/025.
जहाँ एक ओर भारत की सांस्कृतिक विविधता विश्व में अद्वितीय मानी जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मध्यभारत में स्थित छŸाीसगढ़ राज्य का बस्तर अंचल भी अपनी विशिष्ट आदिवासी जीवन शैली, अत्यंत समृद्ध लोकपरंपराओं, एवं जनजातीय शिल्प कलाओं के लिए विश्व-विख्यात है। इस संदर्भ में बस्तर की जीवन-प़द्धति एवं लोक विरासत को अभिव्यक्त करने वाला बस्तर पंडुम एक महत्वपूर्ण जनजातीय उत्सव के रूप में उभरकर सामने आया है जो, इस क्षेेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यह उत्सव न केवल इस अंचल के लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक अभिव्यक्तयों को उद्घाटित करता है, बल्कि शिक्षा और युवा चेतना के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्योें के संरक्षण एवं संवर्द्धन में भी अहम भूमिका निभाता है। इस उत्सव का मूलमंत्र है ”संस्कृति से स्वाभिमान, और शिक्षा से उत्थान”। प्रस्तुत शोध आलेख का मुख्य उद्देश्य बस्तर पंडुम के संदर्भ में संस्कृति, शिक्षा और युवा चेतना के मध्य विद्यमान अंतर्संबंध का विश्लेषण करना है। क्षेत्रीय अवलोकन पर आधारित उक्त अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि, पारंपरिक उत्सव किस प्रकार सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता, क्षेत्रीय समरसता के साथ-साथ युवा पीढ़ी के बौद्धिक एवं समग्र विकास को प्रभावित करते हैं। साथ ही यह इस ओर भी इंगित करता है कि जिस क्षेत्र की युवा शक्ति अपनी मूल पहचान पर गर्वित होकर शिक्षा का सानिध्य लेती हैं, वह अपने समाज का उत्थान निश्चित रूप से कर सकती है।
बस्तर पंडुम, संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपरा, युवा चेतना और शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा.
1. चतुर्वेदी, ए. (2022) बस्तर क्षेत्र की देव प्रतिमाएँ एक अध्ययन. इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़।
भारत में निजता के अधिकार की लड़ाई काफी लम्बी है। उच्चतम न्यायायलय ने अपने विभिन्न न्यायिक निर्णयों1 के माध्यम से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार कि श्रेणी में लाने का प्रयास किया है जो वर्ष 2017 में जस्टिस के एस पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक निर्णय से साकार हुआ। दूसरी ओर विश्व एक डिजिटल युग में प्रवेश कर चूका है जिससे भारत भी अछूता न रहा। प्रौद्योगिकी के विकास ने लोगो के दैनिक जीवन को अत्यधिक प्रभावित किया है। समावेशी डिजिटल पहुँच अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा बन चूका है।2 अनुराधा भसीन के मामले में इन्टरनेट को स्वतंत्र मौलिक अधिकार तो नहीं कहा लेकिन यह माना कि इन्टरनेट के माध्यम से अनुच्छेद 19(1) (a) में अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने का अधिकार शामिल है। फहीम शिरीन बनाम केरल राज्य 2019 के मामले केरल उच्च न्यायालय ने पहली बार इन्टरनेट को अनुच्छेद 21 के साथ जोड़ा था। यह शोध भारत के सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा घोषित “निजता के अधिकार”3 और हाल ही में लागू “डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम 2023” के बीच के संबंधों का विश्लेषण करता है जहाँ निजता भारतीय संविधान में वर्णित अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है जो कि सैद्धांतिक आधार है, वहीं DPDP एक्ट 2023 उसे डिजिटल युग में वैधानिक ढांचा प्रदान कर व्यावहारिक रूप देता है। यह शोध दोनों के बीच सामंजस्य और संभावित विरोधाभासों की जांच करता है तथा इनके बीच के विधिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है तथा यूएसए और यूरोपीय संघ जैसे देशों में डेटा सुरक्षा से संबंधित कानूनों की तुलना करना और यह देखना कि भारत में डेटा की सुरक्षा कैसे की जा रही
निजता का अधिकार, उच्चतम न्यायालय, अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता, डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम.
1. एम.पी.शर्मा बनाम सतीश चन्द्र 1954, खड़कसिंह बनाम उत्तरप्रदेश राज्य (1964) SCR (1) (332), गोविन्द बनाम मध्यप्रदेश राज्य (।प्त् 1975 ैब्त् 1378), आर.राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य 1994, पीयूसीएल बनाम भारत संघ 1997, जस्टिस के.एस. पुट्टा स्वामी बनाम भारत संघ 2017, आधार कार्ड केश 2018।
यह शोध पत्र छत्तीसगढ़ राज्य के रायगढ़ जिला एवं जशपुर जिला में शस्य गहनता के क्षेत्रीय स्वरूप का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। शस्य गहनता कृषि भूमि उपयोग की तीव्रता का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो किसी क्षेत्र में कृषि विकास, संसाधन उपयोग एवं उत्पादकता के स्तर को दर्शाता है। इस अध्ययन में वर्ष 2011 के जिला सांख्यिकी आंकड़ों के आधार पर तहसील स्तर पर शस्य गहनता सूचकांक का आकलन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि रायगढ़ जिले में शस्य गहनता (105.98 प्रतिशत) जशपुर (95.92 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है, जो बेहतर सिंचाई सुविधाओं, दो फसली प्रणाली एवं फसल चक्र के व्यापक उपयोग को दर्शाता है। उच्च शस्य गहनता वाले क्षेत्रों में नलकूप सिंचाई, उपजाऊ मिट्टी एवं तकनीकी विकास प्रमुख कारक हैं, जबकि निम्न शस्य गहनता वाले क्षेत्रों में सिंचाई साधनों की कमी, कम उपजाऊ भूमि एवं एकल फसल प्रणाली प्रमुख बाधाएँ हैं। अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि शस्य गहनता का स्तर सीधे तौर पर संसाधनों की उपलब्धता एवं कृषि तकनीकों के उपयोग पर निर्भर करता है। अतः निम्न शस्य गहनता वाले क्षेत्रों में सिंचाई विस्तार, उन्नत कृषि तकनीकों के प्रसार एवं बहुफसली प्रणाली के अपनाने से कृषि विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं।
शस्य गहनता, कृषि भू-उपयोग, कृषि उत्पादकता, फसल चक्र, क्षेत्रीय विश्लेषण, संसाधन उपयोग.
1. तिवारी, आर.सी. एवं सिंह, बी.एन. (1994) कृषि भूगोल. प्रयाग पुस्तक भवन, इलाहबाद।
मोटर वाहन दुर्घटनाएँ आज के युग में एक गंभीर सामाजिक और कानूनी समस्या बन गई हैं। बढ़ते वाहनों की संख्या, सड़क सुरक्षा नियमों का सही पालन न होना और तकनीकी कारण इसके मुख्य कारण हैं। दुर्घटना के परिणामस्वरूप व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य और संपत्ति को गंभीर हानि पहुँचती है। पारंपरिक कानूनी व्यवस्था में दुर्घटना के लिए जिम्मेदारी तय करने के लिए दोष सिद्ध करना आवश्यक होता है, जिससे मुआवजे की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाती है। दोष रहित दायित्व प्रणाली एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति को दुर्घटना के दोषी को साबित किए बिना ही मुआवजा प्राप्त होता है। इसका उद्देश्य पीड़ित की तुरंत सहायता करना, कानूनी विवादों को कम करना और मुआवजे की प्रक्रिया को तेज बनाना है। इस प्रणाली में वाहन बीमा कंपनियाँ प्राथमिक जिम्मेदार होती हैं और पीड़ित को तुरंत वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। भारत में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दायित्व और मुआवजे के प्रावधान हैं, लेकिन पारंपरिक दोष आधारित प्रणाली में न्याय पाने में लंबा समय लगता है। No-Fault Liability System के लागू होने से दुर्घटना के पीड़ित को शीघ्र मुआवजा मिलता है और न्याय प्रक्रिया सरल हो जाती है। इसके माध्यम से समाज में सड़क सुरक्षा जागरूकता और वाहन मालिकों की जिम्मेदारी भी बढ़ती है। यह अध्ययन दोष रहित दायित्व प्रणाली के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण करता है। इसमें प्राथमिक डेटा के रूप में दुर्घटना मामलों और बीमा कंपनियों के रिकॉर्ड शामिल हैं, और द्वितीयक डेटा में कानूनी जर्नल, शोध पत्र और सरकारी रिपोर्ट शामिल हैं। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दोष रहित दायित्व प्रणाली पारंपरिक दोष आधारित प्रणाली की तुलना में अधिक प्रभावी और न्यायसंगत है।
मोटर वाहन दुर्घटना, दोष रहित दायित्व, मुआवजा, बीमा प्रणाली, सड़क सुरक्षा, कानूनी प्रणाली.
1. Rao, P. (2016) Motor Vehicle Accidents and Legal Reforms in India, Vidhi Sahitya Prakashan, New Delhi.
The National Education Policy (NEP) 2020 represents a paradigm shift in India’s educational framework, emphasizing holistic development, learner-centric pedagogy, and inclusive practices. Among its significant features is the recognition of mental health as an essential component of education, highlighting the need for psychological well-being to ensure quality learning outcomes. The policy advocates for creating stress-free, flexible, and multidisciplinary learning environments that reduce exam-centric pressures and promote creativity, critical thinking, and socio-emotional learning. Provisions such as the introduction of counselors, trained teachers, and awareness programs in schools underscore the policy’s focus on emotional resilience and life skills. Furthermore, NEP 2020 integrates mental health into discussions on equity and access, acknowledging challenges faced by marginalized communities, children with special needs, and those affected by social and economic disparities. By linking mental health with curriculum reforms, teacher training, and technology-enabled learning, the policy underscores a comprehensive vision for student well-being in the 21st century. However, translating these goals into practice demands systemic reforms, adequate resource allocation, capacity-building, and collaboration between educators, health professionals, and policymakers. In this context, NEP 2020 not only redefines education but also frames mental health as a cornerstone for fostering resilience, inclusivity, and human potential.
NEP 2020, Mental Health, Holistic Education, Socio-emotional Learning, Well-being, Resilience.
1. Choudhury, A. & Singh, R. (2021) Digital interventions in education and student mental health. Journal of Educational Technology in India, 6(2), 112–120.
The rapid growth of digital technologies has transformed the landscape of political participation, governance, and civic engagement across the world. However, this transformation has also exposed persistent disparities collectively known as the digital divide, which includes unequal access to digital devices, internet connectivity, and digital skills. These gaps significantly influence an individual’s ability to participate meaningfully in democratic processes, thereby affecting the broader ideal of political equality. In many societies, digital exclusion overlaps with existing socio-economic inequalities, disproportionately affecting rural populations, women, marginalized communities, and economically weaker groups. As Governments increasingly adopt digital platforms for information dissemination, service delivery, and citizen interaction, those excluded from digital spaces risk political invisibility and reduced agency. Furthermore, the digital divide impacts not only access but also the quality of participation. Individuals with higher digital literacy have greater access to political information, online debates, policy discussions, and e-governance systems, enabling them to influence decision-making more effectively. Conversely, those with limited skills or access face systematic barriers that weaken their political voice. The rise of algorithm-driven content and digital misinformation further complicates the landscape, creating new forms of inequality related to information exposure and political persuasion. This overview argues that bridging the digital divide is essential for ensuring inclusive political participation and strengthening democratic values. Addressing infrastructure gaps, enhancing digital literacy, and ensuring equitable access to online civic spaces are critical steps toward achieving true political equality in the digital age.
Digital, Technologies, Political Equality, Divide.
1. Allcott, H. & Gentzkow, M. (2017) Social Media and Fake News in the 2016 Election. Journal of Economic Perspectives, 31(2), 211–236.
इस शोध का प्राथमिक उद्देश्य यह स्थापित करना है कि वर्तमान डिजिटल परिदृश्य में साइबर सुरक्षा केवल एक तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि एक मौलिक मानवाधिकार है। यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि नागरिकों को सीमा पार साइबर खतरों से बचाना राज्य का संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य है। शोध का तर्क है कि डिजिटल संप्रभुता और व्यक्तिगत निजता का उल्लंघन सीधे तौर पर ‘जीवन के अधिकार‘ को प्रभावित करता है। प्रस्तुत शोध में गुणात्मक विश्लेषण पद्धति का प्रयोग किया गया है। इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संधियों, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार चार्टर, नाटो और एफबीआई द्वारा निर्धारित साइबर-आतंकवाद की परिभाषाओं और वैश्विक कानूनी दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया गया है। साथ ही, हाल के वर्षों में हुए प्रमुख साइबर हमलों और उनके सामाजिक-राजनैतिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है ताकि सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच के संबंधों को समझा जा सके। साइबर सुरक्षा की कमी सीधे तौर पर निजता और सुरक्षा के अधिकारों का उल्लंघन है। जहाँ एक ओर साइबर कैफे और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स द्वारा रिकॉर्ड रखना अपराध नियंत्रण के लिए अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर राज्य द्वारा की जाने वाली निगरानी को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना आवश्यक है। 21वीं सदी में साइबर-आतंकवाद पारंपरिक हिंसा से अधिक घातक सिद्ध हो रहा है क्योंकि यह बिना किसी शोर के देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को पंगु बना सकता है। अतः भविष्य की रणनीतियों में ‘एथिकल हैकिंग‘ और कानूनी सुरक्षा चक्र के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचना अनिवार्य है, ताकि तकनीक का उपयोग मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए किया जा सके।
साइबर सुरक्षा, मानवाधिकार, साइबर-आतंकवाद, डिजिटल निजता, सीमा पार खतरे, राज्य का कर्तव्य.
1. Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) vs Union of India (2017) निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय।
कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति लैंगिक उत्पीड़न एक गंभीर सामाजिक और कानूनी समस्या के रूप में उभरकर सामने आया है, जो न केवल महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा को प्रभावित करता है, बल्कि उनके कार्य प्रदर्शन, मानसिक स्वास्थ्य और पेशेवर विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह शोध-पत्र कार्यस्थल पर होने वाले विभिन्न प्रकार के लैंगिक उत्पीड़न जैसे शारीरिक, मौखिक, गैर-मौखिक और डिजिटल उत्पीड़न का विश्लेषण करता है तथा इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत कारणों की पड़ताल करता है। अध्ययन में भारत में लागू कानूनों और नीतियों, विशेष रूप से कार्यस्थल पर महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है साथ ही, यह शोध कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने में नियोक्ताओं की भूमिका, आंतरिक शिकायत समितियों की प्रभावशीलता और जागरूकता की कमी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डालता है। यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति में परिवर्तन, लैंगिक संवेदनशीलता का विकास, और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। अंततः, यह अध्ययन नीति-निर्माताओं, संस्थानों और समाज के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रदान करता है ताकि कार्यस्थलों को महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और समान अवसरों वाला बनाया जा सके। शोध निष्कर्ष दर्शाते हैं कि केवल विधिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संस्थागत पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, और सुरक्षित रिपोर्टिंग तंत्र का होना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थल पर समावेशी और सम्मानजनक संस्कृति का निर्माण, नेतृत्व स्तर पर प्रतिबद्धता, तथा कर्मचारियों के बीच लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। अंततः, यह अध्ययन सुझाव देता है कि नीति-निर्माताओं, संगठनों और समाज को मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जहाँ महिलाएँ बिना किसी भय या भेदभाव के सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से कार्य कर सकें। यह शोध भविष्य के अध्ययन के लिए भी दिशा प्रदान करता है, विशेषकर ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में लैंगिक उत्पीड़न की स्थिति के गहन विश्लेषण के संदर्भ में।
लैंगिक उत्पीड़न, महिला सुरक्षा, यौन उत्पीड़न, महिला अधिकार, मानसिक उत्पीड़न, कार्यस्थल नीति.
1. Agnes, Flavia (2013) Law and Gender Inequality: The Politics of Women’s Rights in India. Oxford University Press, Oxford.
डिजिटल संचार क्रांति ने भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति, विशेषकर दिल्ली में चुनावी अभियानों और जनमत निर्माण की प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित किया है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान फेसबुक और यूट्यूब ने राजनीतिक दलों को मतदाताओं तक पहुँचने, उन्हें संगठित करने और चुनावी विमर्श को आकार देने के प्रभावी साधन प्रदान किए। यह अध्ययन इन दोनों प्लेटफ़ॉर्मों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनकी संरचनात्मक विशेषताएँ, प्रचार रणनीतियाँ, सामग्री स्वरूप, मतदाता सहभागिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव का मूल्यांकन किया गया है। इसके लिए भारतीय निर्वाचन आयोग (2019) की रिपोर्ट, आईएएमएआई के आँकड़े तथा विभिन्न शैक्षणिक और मीडिया स्रोतों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि फेसबुक ने माइक्रो-टार्गेटिंग, सामुदायिक समूहों और त्वरित संवाद के माध्यम से प्रत्यक्ष मतदाता सहभागिता को बढ़ावा दिया, जबकि यूट्यूब ने दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति, विस्तृत भाषणों और एल्गोरिदमिक प्रसार के माध्यम से दीर्घकालिक धारणा निर्माण को सुदृढ़ किया। इस प्रकार दोनों मंचों ने चुनावी राजनीति को अधिक सहभागी और डिजिटल रूप से उन्मुख बनाया, हालांकि फेक न्यूज़, एल्गोरिदमिक ध्रुवीकरण और डेटा गोपनीयता जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं, जो भविष्य में नियमन और डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता को दर्शाती हैं।
दिल्ली लोकसभा चुनाव, फेसबुक, यूट्यूब, डिजिटल राजनीति, राजनीतिक संचार, मतदाता जागरूकता.
1. Castells, M. (2012) Networks of outrage and hope: Social movements in the Internet age. Polity Press. ISBN: 978-0745662855. https://www.politybooks.com/bookdetail?book_slug= networks-of-outrage-and-hope, Accessed on 14/01/2026.
The phenomenon of defensive medicine has emerged as a significant concern at the intersection of healthcare delivery and medical negligence law. The purpose of this study is to critically examine how the fear of litigation influences clinical decision-making and its consequent impact on the quality, accessibility, and efficiency of healthcare services. The methodology adopted in this research is primarily doctrinal and analytical, involving a detailed examination of legal principles governing medical negligence, including the doctrines of duty of care, breach, and causation, along with judicial precedents and secondary sources such as legal commentaries, medical journals, and policy reports. The key findings of the study reveal that the growing apprehension of malpractice litigation compels healthcare professionals to engage in both positive and negative defensive practices. These include over-prescription of diagnostic tests and procedures, excessive reliance on documentation for legal protection, and avoidance of high-risk patients.
Defensive Medicine, Medical Negligence, Fear of Litigation, Duty of Care, Standard of Care, Bolam Principle.
1. The Consumer Protection Act, 2019 (India).
विद्यालय बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास का प्रमुख केंद्र होते हैं किंतु हाल के वर्षों में विद्यालयों में छात्रों के बीच धमकाने, मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा की घटनाएँ बढ़ती हुई देखी गई हैं। ऐसी घटनाएँ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और शैक्षणिक प्रदर्शन पर गंभीर प्रभाव डालती हैं। भारत में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विधिक प्रावधान जैसे Right to Education Act 2009, Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act 2012 तथा Juvenile Justice Act 2015 लागू किए गए हैं। इन कानूनों के अंतर्गत विद्यालय प्रशासन पर यह दायित्व होता है कि वे बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराएँ। यह शोध विद्यालयों की जिम्मेदारियों, विधिक प्रावधानों तथा न्यायिक दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यदि स्कूल प्रशासन उचित निगरानी, जागरूकता कार्यक्रम, काउंसलिंग व्यवस्था और अनुशासनात्मक नीति लागू करे, तो बुलिंग और छात्र हिंसा की घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सकता है।
बुलिंग, स्कूल सुरक्षा, छात्र संरक्षण, बाल अधिकार.
1. भारतीय संविधान
वर्तमान परीक्षा प्रणाली संकुचित व संकीर्ण है। यह विद्यार्थियों के नैतिक स्तर को भी निम्न बनाने के लिए उत्तरदायी है। नैतिक स्तर का मूल्यांकन परीक्षाओं में समाहित न होने की वजह से विद्यार्थी नैतिकता सम्बन्धी बातों में रूचि नहीं रखते। इसका हाानिकारक प्रभाव विद्यार्थियों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। परीक्षा के दौरान छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अंकन प्रणाली में विश्वसनीयता का अभाव हो गया है। आज मूल्यांकन प्रक्रिया में कितनी पारदर्शिता है ये हम सभी जानते हैं इसलिए आवश्यकता है रचनात्मकता, सहयोग और भावनात्मक बुद्धिमता सहित दक्षताओं की एक विस्तृत श्रंृखला को शामिल करने के लिए छात्र के प्रदर्शन के मूल्यांकन के मानदंडों का विस्तार करें साथ ही वैकल्पिक मूल्यांकन विधियों का प्रयोग करते हुए प्रासंगिक मूल्यांकन की ओर बदलाव को प्रोत्साहित करें। परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में छात्रों के साथ अध्यापकों व अभिभावकों का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्यापकों व अभिभावकों द्वारा सम्पूर्ण आंकलन हमें संकेत देते हैं कि बच्चों के सीखने में कहां कमी रह गई है जिसके आधार पर सीखने में सुधार के लिए उचित समय पर आवश्यक कदम उठाये जा सके।
संकुचित, संकीण, पारदर्शिता, रचनात्मकता, भावनात्मकता बुद्धिमता.
1. अग्रवाल, ईश्वर प्रकाश (2002) अनिताः कार्यक्रम आयोजन. आर्य बुक डिपो, नई दिल्ली।
भारतीय ज्ञान एवं परम्परा में धन को धर्म और आध्यात्म से जोड़ा गया हैं। धन अर्जन की प्रक्रिया में धर्म आधारित व्यवस्था कर नैतिकता को स्थान दिया गया हैं, लेकिन वर्तमान समय में यह विचार कितना प्रासांगिक है इस बात का विश्लेषण यह शोध पत्र करता हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय जन मानस के धन के प्रति सोच में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन किया गया है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों, वेदों एवं उपनिषदों में जो आर्थिक विचार हैं, क्या वह विचार अभी भी लोगों में है? शोध पत्र के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी के लोगों की धन के प्रति क्या सोच है? क्या व्यक्ति आज धन को ही सर्वाेपरि मानता है? प्राचीन भारतीय दर्शन के आर्थिक विचारों का अध्ययन करना साथ ही भारतीय परंपरा और आधुनिक सोच कर तुलनात्मक अध्ययन करना, धन के अर्जन से होने वाली सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्या-क्या परिवर्तन हो रहे हैं उसका अध्ययन करना एवं वर्तमान आर्थिक नीतियों में नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व की कमी का अध्ययन करना इसका उद्देश्य है। यह अध्ययन प्राथमिक समंकों पर आधारित हैं। सूचनादाताओं से विभिन्न जानकारी प्राप्त कर उसका विश्लेषण किया गया हैं। इनमें मुख्य रूप से उच्च शिक्षित वर्ग सम्मिलित है। शोध अध्ययन में पाया कि आज वर्तमान समय में भी व्यक्ति धन को सर्वाेपरि नहीं मानता है। वैदिक और उपनिषद के आर्थिक विचार मौजूद है, लेकिन जीवन यापन और आधुनिक जीवन शैली के दबाव में उसने धन को महत्व देना जरूरी समझते है। वह पुराने धन संबंधी सोच और नए जीवन शैली के तनाव के बीच संघर्ष की स्थिति में है, जहां वह सोच से तो वैदिक है, लेकिन कर्मों में धन की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए धन को महत्व देना उसकी मजबूरी बन रही है।
भारतीय ज्ञान, परंपरा, सामाजिक समानता, धन, आधुनिक सोच एवं आर्थिक नीतियां.
1. अथर्ववेद. अथर्ववेद संहिता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, व्याख्याकार) अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा (काण्ड 3, सूक्त 24, मंत्र 5). 2015.
प्रस्तुत शोध-पत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन में सोशल मीडिया के प्रभावों का कृषक और नौकरीपेशा वर्ग के मध्य तुलनात्मक अध्ययन की विवेचना करता है। डिजिटल क्रांति, इंटरनेट की सुलभता और स्मार्टफोन के व्यापक प्रसार ने शहरी समाज के समानान्तर ग्रामीण समाज की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन किए हैं। कृषक वर्ग के लिए सोशल मीडिया एक सूचना-स्रोत के रूप में उभरा है, जिसके माध्यम से वे कृषि संबंधी नवीन तकनीकों, मौसम पूर्वानुमान, फसल बीमा, मंडी भाव और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इससे उनकी कृषि उत्पादकता और निर्णय प्रक्रिया पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। वहीं दूसरी ओर नौकरीपेशा ग्रामीण वर्ग सोशल मीडिया का उपयोग मुख्यतः रोजगार संबंधी जानकारी, पेशेवर नेटवर्किंग, ऑनलाइन प्रशिक्षण, सूचना अद्यतन और मनोरंजन के लिए कर रहा है। इस वर्ग के लिए सोशल मीडिया कार्य-जीवन संतुलन और सामाजिक पहचान के निर्माण का भी एक माध्यम बन गया है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया ने दोनों वर्गों में सामाजिक सहभागिता और जागरूकता को बढ़ाया है, किंतु इसके प्रभाव समान नहीं हैं। जहां कृषकों के लिए सोशल मीडिया ग्रामीण विकास और कृषि नवाचार का साधन बना है, वहीं नौकरीपेशा वर्ग में यह जीवनशैली, उपभोग प्रवृत्तियों और वैश्विक दृष्टिकोण को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही फेक न्यूज, साइबर धोखाधड़ी, सूचना की अधिकता और डिजिटल साक्षरता की कमी जैसी चुनौतियाँ दोनों वर्गों के लिए समान रूप से विद्यमान हैं। कुल मिलाकर इस शोध से निष्कर्ष निकलता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन में सोशल मीडिया की भूमिका बहुआयामी है और कृषकों तथा नौकरीपेशा वर्ग के सामाजिक-आर्थिक संदर्भों के अनुसार इसके प्रभावों में स्पष्ट भिन्नता पाई जाती है।
सोशल मीडिया, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ग्रामीण जीवन, कृषक, नौकरीपेशा.
1. शर्मा, रमेश कुमार (2016) सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का सामाजिक परिवर्तन पर प्रभाव. भारतीय समाजशास्त्रीय शोध पत्रिका, 8(1), 45-52।
भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। प्राचीन काल में कृषि करना सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। जब वस्तु विनिमय की प्रणाली रही तब तक यह व्यवसाय भी समृद्ध रहा। धीरे-धीरे इस व्यवसाय में भारी बदलाव आते रहे जिसका परिणाम कृषकों पर होता रहा। सबसे पहले जो सार्वजनिक कृषि-भूमि थी वह निजी हो गयी। पीढ़ी दर पीढ़ी वह टुकड़ों में बँटती चली गयी। कृषि पर कर लगाया गया जिसको भरते-भरते कृषक निर्धन होते रहे और इसके परिणामस्वरूप आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गए। आज के उन्नत भारत में भी किसान की स्थिति में उतना बदलाव नहीं आया। कहीं न कहीं इसके लिए संपूर्ण व्यवस्था ही जिम्मेदार है। जो सभी का पेट भरने के लिए दिन रात एक करता है, उसके लिए दो समय का खाना भी नसीब न हो यह दुखद बात है। आज स्त्री विमर्श, किन्नर विमर्श, वृद्ध विमर्श, बाल विमर्श के साथ-साथ किसान विमर्श पर भी लिखा जा रहा है। इससे देशभर के किसानों की स्थिति सामने आ रही है। देश के अनेक राज्यों में अनेक भाषाओं में किसान से संबंधित अनेक समस्याएँ, उनकी पारिवारिक स्थिति, आर्थिक स्थिति से लोग अवगत हो रहे हैं। प्रेमचंद का ‘गोदान’ संजीव जी का ‘फाँस’ वीरेंद्र जैन का ‘डूब’, एस. आर. हरनोट का ‘हिडिम्ब’, राजू शर्मा का ‘हलफ़नामा’ मधु कांकरिया का ‘ढलती साँझ का सूरज़’ आदि उपन्यास किसान जीवन का यथार्थ चित्रण पाठक के सामने रखते हैं। इन सारे उपन्यासों में किसानों का जीवन, उनकी समस्याएँ, शोषण, समाज एवं राजनीति से उपेक्षित, अंधविश्वास, गरीबी, अशिक्षा, प्राकृतिक आपदाएँ, कर्ज़ का बोझ और ऐसी ही अनगिनत समस्याओं से गुजरते हुए इसके अंतिम उपाय के रूप में आत्महत्या तक की यात्रा का चित्रण मिलता है। आर्थिक तंगी से बाज़ आकर आत्महत्या के लिए किसानों का प्रवृत्त होना समाज के लिए कितना खतरनाक है! किसानों की ऐसी स्थिति को देखकर नवयुवक खेती को व्यवसाय के रूप में कैसे अपनाएँगे? ऐसे ही अनगिनत सवाल लेखकों ने अपने साहित्य में उठाए हैं। मधु कांकरिया का उपन्यास ‘ढ़लती साँझ का सूरज’ अपने आप में अनोखा उपन्यास है जिसमें लेखिका किसानों की कई समस्याओं की ओर पाठक का ध्यान खिंचती है और नए युग के निर्माता भारतीय युवकों के द्वारा बहुत कुछ किए जाने की संभावनाओं की ओर दिशा निर्देश करती है।
किसान, आत्महत्या, फ़सल, बीज, शोषण, युवक.
1. कांकरिया, मधु (2024) ढलती साँझ का सूरज़. राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. 19।
आत्म-अभिव्यक्ति का तात्पर्य अपने विचारों एवं अपनी रुचियांे का उपयोग करके अपनी भावनाओं को दूसरों के समक्ष स्पष्ट रूप से व्यक्त करना है। इसमें एक व्यक्ति के रूप में पहचान बनाने की सक्षमता होती है एवं व्यक्ति की अदृश्य आत्म-पहचान का प्रकटीकरण पसंद, विश्वास, राय, लक्षण एवं दृष्टिकोण में प्रदर्शित होता है। स्वस्थ्य रहने हेतु जो व्यक्ति सबसे अच्छा काम कर सकता है वही आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर को भी खोज कर सकता है। विद्यार्थियांे द्वारा अपने संस्थान मंे रणनीतिक प्रयास करने और रणनीतिक सामग्रियों से सकारात्मक व्यवहारों के प्रदर्शन से उनके आत्म-अभिव्यक्ति पर पूर्णतः प्रभाव पड़ता है। यह तो प्रकट करने की एक प्रक्रिया होती है, जो मौखिक लिखित या कलात्मक गुण को प्रकाशित करती है। इसके माध्यम में विद्यार्थी अपने अनुभवों को भाषा, कला, हाव-भाव या अन्य क्रियाकलाप (लेखन, संगीत, नृत्य, चेहरे के भाव) से करते हैं।
आत्म-जागरूकता, सृजनात्मकता, भावनाएँ अंतर्मन, अभिव्यक्ति, स्व-पहचान.
1 हुआर्टा, डी. ला. (2014) आत्म-अभिव्यक्ति की शक्ति, द हफिंगटन पोस्ट. http://www.hffuingtonpost.com, Assessed on 10/01/2026.
भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन क्षेत्र कृषि का पूरक एवं ग्रामीण आय का प्रमुख स्रोत है। भारत विश्व में दुग्ध उत्पादन में अग्रणी है, किंतु प्रति पशु उत्पादकता अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है। छत्तीसगढ़ राज्य, विशेषकर रायपुर जिला, पशुपालन आधारित आजीविका के विस्तार की दृष्टि से उभरता हुआ क्षेत्र है। केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाएँ जैसे राष्ट्रीय गोकुल मिशन, राष्ट्रीय पशुधन मिशन, राष्ट्रीय डेयरी योजना तथा पशुपालन अवसंरचना विकास निधि ने उत्पादकता एवं लाभ वृद्धि के लिए संरचनात्मक आधार प्रदान किया है। प्रस्तुत शोध में रायपुर जिले के संदर्भ में इन योजनाओं के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन द्वितीयक आँकड़ों, जिला पशुपालन कार्यालय रिपोर्टों तथा सहकारी दुग्ध संघों के अभिलेखों पर आधारित है। परिणामों से स्पष्ट है कि दुग्ध संकलन, कृत्रिम गर्भाधान, चारा विकास एवं प्रसंस्करण अवसंरचना में सुधार से आय में वृद्धि हुई है, किंतु तकनीकी प्रशिक्षण, विपणन एकीकरण तथा वित्तीय समावेशन में सुधार की आवश्यकता है।
पशुधन उत्पादकता, रायपुर, छत्तीसगढ़, दुग्ध उत्पादन, सरकारी योजनाएँ, ग्रामीण आय.
1. 20th Livestock CensusChhattisgarh State District-wise Livestock population 2019-20, https://agriportal.cg.nic.in/ahd/PDF_common/census20th/2_Districtwise_Animal_population_ 20th_LSC.pdf, Accessed on 10/01/2026.
विधान को अंग्रेजी भाषा में लेजिस्लेशन कहते हैं जो स्वयं और लेशियो नामक दो लैटिन शब्दों के योग से बना है। लैटिन भाषा में लेजिस शब्द का अर्थ है विधि तथा लेशियो का अर्थ है अतः विधान का शाब्दिक अर्थ है विधि की प्रस्थापना या निर्माण करना। विधि-निर्माण में विधान को सबसे प्रबल, प्रमुख एवं आधिकारिक स्त्रोत माना गया है क्योंकि इसे प्राचीन विधियों को निरसित करने तथा वर्तमान विधियों में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है। विधान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए रास्को पाउंड ने कहा है कि विधि के तीन प्रमुख प्रयोजन हैं-(1) समाज में स्थिरता लाना (2) समाज के प्रत्येक व्यक्ति की अधिकतम स्वाधीनता सुनिश्चित करना, तथा (3) मानव की अधिकतम संतुष्टि। उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विधि के निश्चित नियमों की आवश्यकता हुई जिससे न्याय प्रशासन सुगमतापूर्वक संचालित हो सके। प्राचीन काल में जब विधान जैसी कोई विधि-निर्मात्री शक्ति अस्तित्व में नहीं थी, उस समय प्रथाएँ तथा प्राकृतिक विधि या दैवी विधि के नियमों के आधार पर न्याय व्यवस्था संचालित होती थी, परन्तु समाज के विकास एवं प्रगति के साथ-साथ यह अनुभव होने लगा कि प्रथाएँ तथा प्राकृतिक या दैवी नियम समाज में न्याय व्यवस्था कायम रखने के लिए अपर्याप्त हैं, क्योंकि इन्हें विधि का रूप ग्रहण करने में पर्याप्त समय लगता है। जब तक कोई प्रथा विधि का नियम बन पाये तब तक सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार नई प्रथाएँ जन्म लेती हैं। अतः इस कमी को दूर करने के लिए विधान की आवश्यकता प्रतीत होती है। विधान एक ऐसा साधन है जो प्रथाओं तथा सामाजिक आवश्यकताओं या लोकमत के बीच के रिक्त स्थान की पूति करता है।
विधान निर्माण, डिजिटल, संहिताकरण, सैविग्नी, समाज.
1. परान्जपे, एन.वी. (2019) विधि शास्त्र तथा विधि का सिद्धांत. सेंट्रल लॉ एजेंसी, मोतीलाल नेहरू रोड, प्रयागराज, आईएसबीएन 978-81-941659-3-4।
A comparative study was carried out to evaluate the influence of organic and conventional nutrient management systems on leaf and fruit nutrient composition of apple (Malus domestica Borkh.) cv. Red Delicious grown in Pulwama district, Kashmir Valley. Apple orchards under two distinct management regimes organic (using FYM and bio fertilizers) and conventional (using chemical fertilizers) were analysed for macronutrient (N, P, K, Ca, Mg) and micronutrient (Fe, Zn, Cu, Mn) contents in leaves and fruits. The organically managed orchards exhibited higher levels of calcium, magnesium, potassium, and micronutrients (Zn, Mn, Cu), while conventionally managed orchards showed higher nitrogen and phosphorus concentrations. Organic nutrient management also improved fruit quality attributes by enhancing nutrient balance and reducing heavy metal accumulation. The results highlight the potential of organic systems for sustainable apple production and improved fruit nutritional value in the Himalayan region.
Apple Nutrition, Organic Management, Conventional Farming, Leaf Nutrients, Fruit Quality, Kashmir Valley.
1. Ahmad, S. (2003) Characterization and nutrient indexing of apple (Malus domestica Borkh.) Orchard soils of Bangil area of district Baramulla. M. Sc thesis submitted to Sher-e-Kashmir, University of Agricultural Sciences and Technology of Kashmir, Srinagar, Jammu and Kashmir, p. 104.
The women’s education landscape in India is a deep mirror to the country’s overall socio-political development, marking a transition from ancient inclusivity to entrenched marginalization and, finally, a struggle for reclaiming it over the past century. This trajectory is not just a historical timeline of literacy percentages but a multifaceted tale of power, resistance, and transformation. The National Education Policy (NEP) 2020 comes at a pivotal point in this journey, trying to shatter the age-old impediments that have existed for millennia. Through the incorporation of gender as a horizontal agenda and the recognition of the intersectionality of caste, religion, and geography, NEP 2020 aims to convert the entire education system from an elitist tool to a tool of universal emancipation. To grasp the revolutionary possibilities of modern policies, it is imperative to examine the historical roots of educational exclusion and the revolutionary struggles that made way for modern-day reforms.1
Architecture, Women, Education, Strategic Interventions, NEP 2020.
1. Devi, Rameshwari & Pruthi, Romila (eds.) (1998) Women and the Indian Freedom Struggle: Annie Besant. Pointer Publishers, Jaipur.
अंग्रेजों के शिक्षा-प्रणाली के विरुद्ध राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली के समर्थक में स्वामी विवेकानन्द का नाम प्रमुख है। ज्ञान क्या है, इसमें प्राचीन भारतीय और आधुनिक पाश्चात्य मत में स्पष्ट विभिन्नता प्रतीत होता है, किन्तु मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति तभी होती है जब उसे भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान हो। प्राचीन भारतीय शिक्षा के अनुसार ज्ञान व्यक्ति के भीतर उत्पन्न होता है, बाह्य वातावरण के प्रभाव से नहीं। ज्ञान का स्रोत हमारे भीतर है तो व्यक्ति शिक्षा स्वयं से भी प्राप्त किया जा सकता है। विवेकानन्द के अनुसार “जिस तरह आप एक पौधा नहीं उगा सकते, उसी तरह आप किसी बालक को शिक्षा नहीं दे सकते।” शिक्षक का कार्य बालक के मार्ग में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने में सहयोग करना है। बालक को उन्मुक्त रखना चाहिए, अनावश्यक माता-पिता या शिक्षक को दबाव नहीं देना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार बालक को विकसित होने का उचित अवसर देना चाहिए। वेदांत दर्शन के सार्वभौमिक सिद्धांत और मानवतावादी शिक्षा वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक और लाभदायक है। नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा के अभाव के कारण ही युवक-युवतियों का चरित्र पतन हो रहा है इसलिए जन-स्त्री, व्यावसायिक, धार्मिक और राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में उचित मार्ग प्रशस्त करने को प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता है। वर्तमान परिस्थितियों के लिए भी स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक-विचार, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए दिशा-निर्देश उचित हैं। स्वामी विवेकानन्द दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, शिक्षा-शास्त्री, समाज-सेवी और दूरदृष्टि की प्रवृति रखते थे, उनका दर्शन समग्र विकास पर केंद्रित था। स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक विचारों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी विद्यार्थियों के विकास में अहम् भूमिका है।
स्वामी विवेकानन्द, शिक्षक, राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली, समाज.
1. कपूर, कारबानू (2024) स्वामी विवेकानन्द का साहित्यक व्यक्तित्व, प्रलेख प्रकाशन, उत्तर प्रदेश।
बाल शोषण आधुनिक समाज की एक गंभीर समस्या है, जो बच्चों के शारीरिक, मानसिक, यौन एवं सामाजिक विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। भारत में इस समस्या के समाधान हेतु विभिन्न विधिक प्रावधान जैसे POCSO Act 2012, Juvenile Justice Act 2015 तथा Right to Education Act 2009 लागू किए गए हैं। इस शोध-पत्र का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में स्थानीय अधिकारियों की क्या भूमिका और जिम्मेदारियाँ हैं। अध्ययन में यह पाया गया है कि स्थानीय प्रशासन जैसे पुलिस, जिला प्रशासन, बाल कल्याण समिति आदि बाल संरक्षण प्रणाली के प्रमुख स्तंभ हैं। यह शोध गुणात्मक विधि पर आधारित है, जिसमें विधिक प्रावधानों, न्यायालयीन निर्णयों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया गया है। शोध से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि स्थानीय अधिकारी अपने कर्तव्यों का प्रभावी और संवेदनशील तरीके से पालन करें, तो बाल शोषण की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। बाल शोषण एक गंभीर सामाजिक और कानूनी समस्या है, जिसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक, यौन एवं आर्थिक शोषण शामिल होते हैं। इसकी रोकथाम में स्थानीय अधिकारियों (जैसे जिला प्रशासन, पुलिस, बाल कल्याण समिति, सामाजिक कार्यकर्ता आदि) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
बाल शोषण, स्थानीय प्रशासन, बाल अधिकार, POCSO Act.
1. भारतीय संविधान।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ईरान-अमेरिका-इजराइल के मध्य बढ़ता हुआ तनाव एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संकट के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और वाणिज्यिक गतिविधियों को गहराई से प्रभावित कर रहा है। इस अध्ययन का उद्देश्य इस संघर्ष के कारण उत्पन्न आर्थिक प्रभावोंकृविशेष रूप से तेल कीमतों में वृद्धि, ऊर्जा संकट, मुद्रास्फीति, तथा वैश्विक व्यापार में व्यवधान का विश्लेषण करना है। यह शोध मुख्यतः द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स, आर्थिक जर्नल्स, तथा विभिन्न शोध अध्ययनों का उपयोग किया गया है। अध्ययन में यह पाया गया कि भू-राजनीतिक संघर्ष का सीधा प्रभाव ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत और परिवहन व्यय में वृद्धि होती है तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप महंगाई बढ़ती है और वाणिज्यिक गतिविधियाँ धीमी पड़ जाती हैं, जिसका प्रभाव विशेष रूप से विकासशील देशों पर अधिक होता है। इसके साथ ही, यह शोध भारतीय ज्ञान प्रणाली के सिद्धांतों जैसे आत्मनिर्भरता, नैतिक व्यापार, संतुलित उपभोग, और वैश्विक सहयोग को आधुनिक आर्थिक संकट के समाधान के रूप में प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित सिद्धांत वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि आधुनिक वैश्विक वाणिज्य अत्यधिक परस्पर निर्भर और संवेदनशील है, जिसके कारण किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ता है। अतः यह आवश्यक है कि वैश्विक आर्थिक नीतियों में भारतीय ज्ञान प्रणाली के सिद्धांतों को समाहित किया जाए, जिससे एक संतुलित, नैतिक और स्थायी आर्थिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सके।
भू-राजनीतिक संघर्ष, वैश्विक व्यापार, तेल कीमतें, मुद्रास्फीति, भारतीय ज्ञान प्रणाली, सतत् वाणिज्य.
1. कौटिल्य (2019) अर्थशास्त्र. अनुवादः एल. एन. रंगराजन, पेंगुइन क्लासिक्स, नई दिल्ली, पृ. 45-60, 120-135।
हिन्दी उपन्यास की परंपरा में मनोहर श्याम जोशी का प्रवेश एक ऐसे रचनाकार के रूप में होता है, जिसने कथा-साहित्य को केवल सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर, उसे मानव-मन की जटिल संरचना, आंतरिक द्वंद्व तथा संबंधों की मनोवैज्ञानिक उलझनों से जोड़ा। उनका उपन्यास-जगत वस्तुतः उस मध्यवर्गीय जीवन का दर्पण है, जहाँ बाह्य घटनाओं से अधिक महत्वपूर्ण मन के भीतर घटित होने वाली प्रक्रियाएँ होती हैं। मनोहर श्याम जोशी ऐसे उपन्यासकार हैं जिनके यहाँ कथा का विकास किसी नाटकीय घटना-क्रम से नहीं, बल्कि चेतना की सूक्ष्म गतियों, स्मृति, अवसाद, कुंठा, आकांक्षा और असफलता-बोध से होता है। इस दृष्टि से उनका उपन्यास-जगत पारंपरिक कथानक-प्रधान उपन्यासों से भिन्न और आधुनिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास की परंपरा से अधिक समीप है। मनोहर श्याम जोशी का रचनात्मक विकास पत्रकारिता, नाटक और टेलीविजन लेखन के माध्यम से हुआ। इस बहुआयामी अनुभव ने उनके उपन्यासों को एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान की। पत्रकारिता ने उन्हें समाज की विसंगतियों से जोड़ा, जबकि नाट्य और टेलीविजन लेखन ने संवाद, चरित्र-चित्रण तथा मनोवैज्ञानिक तनाव को उभारने की क्षमता प्रदान की। उनके उपन्यासों में संवाद केवल कथोपकथन नहीं रह जाते, बल्कि पात्रों की मानसिक अवस्था, असंतोष, दुविधा और आत्मसंघर्ष को उद्घाटित करने का माध्यम बनते हैं। यही कारण है कि जोशी के पात्र बाहरी क्रियाओं से कम और आंतरिक प्रतिक्रियाओं से अधिक पहचाने जाते हैं।
मनोविज्ञान, साहित्य, मनोहर श्याम जोशी, मध्यवर्ग, संस्कृति, पत्रकारिता.
1. सिंह, नामवर (2002) आधुनिक हिन्दी उपन्यास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
The rapid development of Artificial Intelligence (AI) has transformed various aspects of human life, including communication, governance, education, and economy. While AI is often associated with modern technological advancement, its philosophical and ethical dimensions resonate with ancient knowledge systems. Bharatiya Gyan Parampara (Indian Knowledge Tradition) represents a rich intellectual heritage rooted in philosophical inquiry, ethical reflection, and holistic understanding of knowledge. This paper examines the relationship between Bharatiya Gyan Parampara and Artificial Intelligence from a sociological perspective. It explores how traditional Indian epistemology, ethics, and holistic thinking can contribute to contemporary debates on AI development, governance, and ethical use. The study argues that integrating the principles of Indian knowledge traditions such as interconnectedness, ethical responsibility, and knowledge as a tool for social welfare can provide a culturally rooted framework for responsible AI development in India and beyond.
Bharatiya Gyan Parampara, Artificial Intelligence, Sociology.
1. NITI Aayog (2018) National Strategy for Artificial Intelligence – AI for All. NITI Aayog, New Delhi.
Indian Muntjac, Muntiacus muntjak (Zimmerman 1780) is a species under cervidae family, naturally found in the forested regions of south and south-east Asia. To understand their behaviour, a study was made on the Muntiacus muntjak inthe captivity of Jawaharlal Nehru Biological Park, Bokaro, Jharkhand in different season using Scan Sampling Method. It was observed that barking deer spent 52.37 percent of time in activity while rest of time they were in resting during the diurnal hours. Among the daily activities, 20.63% of time spent in movement, followed by 12.10% of time in scanning, 11.11% time in feeding and rest 8.53% time spent in other activities mainly the social activities. The seasonal activity pattern of both male and female Indian Muntjac shows that resting is the dominant behavior, ranging from about 35% to 52% across seasons. Feeding and movement activities are moderate, varying between approximately 10%–20% and 14%–20%, respectively. Scanning behavior remains relatively low (about 6%–14%) but shows a slight increase during winter, especially in females. Social activity is minimal in both sexes, ranging from nearly 5% to 11% with little seasonal variation. Overall, these patterns indicate seasonal influence on activity distribution under captive conditions at Jawaharlal Nehru Biological Park. The study revealed that barking deer in the captivity get equal habitat type, food supply and security from the predators, they have difference in their behaviour, mainly on basic activities. The variation in basic activities might be due to their difference in morphology, size, sex, age, etc.
Barking Deer, Muntiacus, Captivity, Behaviour, Bokaro.
1. Aktar, M.; Ahammed, R.; Khan, M.M.H.; Kabir, M. (2015) Preliminary Findings on Behavioral Patterns of The Barking Deer, Muntiacus muntjak (Zimmermann 1780) In Captivity at Dhaka Zoo in Bangladesh. J. Asiat. Soc. Bangladesh, Sci., 41, 233–243, doi:10.3329/jasbs.v41i2.46207.
भारतीय काव्यशास्त्र में रसों का स्थान सर्वाेपरि है। रस ही वह तत्व है जो काव्य को प्राणत्व प्रदान करता है। आचार्य भरतमुनी से लेकर आधुनिक आचार्याे ने रस को काव्य का आत्मतत्व माना है। मानवीय संवेदनाओं में रसों के ब्रम्हबीज निहित होते हैं। कवि अपने भावाभिव्यक्ति में किसी रस को लक्ष्य करके कोई सृजन नही करता अपितु समसमायिक घटनाक्रम ही रसों को जन्म देती है। रसों की निष्पत्ति लोकपरंपरा तथा लोकाचार की समसमायिक भावों से होती है। लोकसंस्कृति में काव्य एवं परंपरा मनुष्य के प्रारंभिक जीवन से प्रतिछाया की तरह आज भी साथ चल रही है। ऐसे ही अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपरा एवं साहित्यिक क्षेत्रों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश के साहित्यकारों ने अपने काव्यकृतियों में रसाभिव्यक्ति से काव्य को सुंदर एवं सहज बनाया है। लोकभाषा में रचे काव्य में रस, परंपरा, लोकजीवन, लोकसाहित्य, प्रकृति प्रेम एवं धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र में रस का स्थान महत्वपूर्ण है, जो लोकसाहित्य को पूर्णता प्रदान करती है।
रस, लोकसाहित्य, काव्य, छत्तीसगढ़ी काव्य, रसाभिव्यक्ति.
1. पाण्डेय,सरस्वती गोविन्द (2017) हिन्दी भाषा एवं साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास. अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 405।
This Paper explores the role of financial literacy in enhancing women’s empowerment in the context of Sustainable Development Goals (SDGs) in Bihar. Financial literacy equips women with the ability to manage financial resources effectively, make informed decisions, and improve their socio-economic status. It plays a significant role in achieving several SDGs, such as poverty reduction, gender equality, quality education, and inclusive economic growth. Despite various initiatives aimed at promoting financial inclusion, a large number of women in Bihar continue to face challenges in accessing and effectively utilizing financial services. The study is based on secondary data collected from government reports and academic sources, and it analyzes how financial knowledge contributes to women’s independence and economic stability. The findings indicate that financially literate women are more confident, self-reliant, and economically secure, which ultimately leads to an improved standard of living and broader community development. The study concludes that strengthening financial literacy among women is crucial for achieving sustainable empowerment and long-term development in Bihar.
Financial Literacy, Women’s Empowerment, Sustainable Development Goals, Financial Inclusion, Socio-Economic Development.
1. Arofah, A. A. & Maharani, D. A. (2021) Demographic, financial literacy, and financial behavior of women working in manufacturing industry. Economic Education Analysis Journal, 10(3), 381–393. https://doi.org/10.15294/eeaj.v10i3.46907
किशोरावस्था मानव विकास का एक संवेदनशील चरण है, जिसमें विद्यार्थियों में सामाजिक, भावनात्मक और संज्ञानात्मक परिवर्तनों की तीव्रता बढ़ जाती है। इस शोध का उद्देश्य किशोर विद्यार्थियों में सामाजिक परिपक्वता और संवेगात्मक बुद्धि के बीच विद्यमान संबंध का अध्ययन करना था। अध्ययन हेतु महासमुन्द जिले के 200 विद्यार्थियों (100 छात्र और 100 छात्राएँ) का यादृच्छिक रूप से चयन किया गया। सामाजिक परिपक्वता मापन हेतु नलिनी राव (2018) की सामाजिक परिपक्वता मापनी तथा संवेगात्मक बुद्धि मापन हेतु सरकार एवं सरकार द्वारा निर्मित मापनी का प्रयोग किया गया। प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण SPSS (v-28.0.0) के माध्यम से सहसंबंध पद्धति द्वारा किया गया। विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि सामाजिक परिपक्वता का मध्यमान 242.38 तथा संवेगात्मक बुद्धि का मध्यमान 193.74 है। सहसंबंध गुणांक r = 0.51 प्राप्त हुआ, जो .05 के सार्थकता स्तर पर महत्वपूर्ण है। यह परिणाम संकेत करता है कि सामाजिक परिपक्वता और संवेगात्मक बुद्धि के बीच मध्यम एवं सकारात्मक संबंध मौजूद है। इससे स्पष्ट होता है कि जिन किशोरों की सामाजिक परिपक्वता अधिक होती है, वे भावनात्मक परिस्थितियों को अधिक प्रभावी ढंग से समझते, संभालते और नियंत्रित करते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष शिक्षा, नीति, परामर्श कार्यक्रमों तथा विद्यालयी जीवन-कौशल शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करते हैं। यह शोध किशोर विद्यार्थियों के समग्र विकास में सामाजिक एवं भावनात्मक कौशलों की अनिवार्यता को रेखांकित करता है तथा भविष्य में व्यापक नमूने और विविध सामाजिक समूहों पर आधारित अनुसंधान की आवश्यकता को भी इंगित करता है।
सामाजिक परिपक्वता, संवेगात्मक बुद्धि, किशोरावस्था, सहसंबंध, व्यक्तित्व विकास
1. Bika, S. L. (2021) Understanding adolescent students’ emotional intelligence and adjustment. International Journal of Creative Research Thoughts, 9(8), 552–555.
वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक शैक्षिक वातावरण में विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों में अध्ययन आदतें प्रमुख भूमिका निभाती हैं। प्रभावी अध्ययन आदतें न केवल सीखने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाती हैं, बल्कि विद्यार्थियों के आत्म-अनुशासन, समय-प्रबंधन और अकादमिक प्रदर्शन को भी सुदृढ़ करती हैं। प्रस्तुत विश्लेषणात्मक अध्ययन का उद्देश्य विद्यार्थियों की अध्ययन आदतों और उनकी शैक्षिक उपलब्धि के मध्य संबंध की जाँच करना था। अध्ययन में धरसीवा विकासखंड के 100 उच्चतर माध्यमिक विद्यार्थियों (50 छात्र एवं 50 छात्राएँ) को यादृच्छिक विधि से चुना गया। अध्ययन आदतों के मापन हेतु मुखोपाध्याय एवं सनसनवाल (1985) द्वारा विकसित अध्ययन आदत मापनी तथा शैक्षिक उपलब्धि के लिए कक्षा 10वीं के वार्षिक परीक्षा के प्राप्तांक लिए गए। सांख्यिकीय विश्लेषण हेतु SPSS (Version 28.0.0) में सहसंबंध तकनीक का उपयोग किया गया। विश्लेषण के अनुसार अध्ययन आदतों का मध्यमान 16.74 तथा शैक्षिक उपलब्धि का मध्यमान 60.59 था। दोनों चरों के मध्य सहसंबंध गुणांक त = 0.86 प्राप्त हुआ, जो .05 स्तर पर अत्यधिक सार्थक पाया गया। परिणामों ने स्पष्ट किया कि सुव्यवस्थित और सकारात्मक अध्ययन आदतें विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाती हैं। यह अध्ययन शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षादृनीति निर्माताओं के लिए यह संकेत देता है कि अध्ययन आदतों के विकास हेतु प्रशिक्षण एवं अनुकूल शिक्षण वातावरण उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है, ताकि विद्यार्थियों की शैक्षणिक सफलता को मजबूत आधार मिल सके।
अध्ययन आदतें, शैक्षिक उपलब्धि, सहसंबंध, समय-प्रबंधन, सीखने की रणनीतियाँ.
1. Aljaffer, M. A.; Almadani, A. H.; AlDughaither, A. S.; Basfar, A. A.; AlGhadir, S. M.; AlGhamdi, Y. A.; AlHubaysh, B. N.; AlMayouf, O. A.; AlGhamdi, S. A.; Ahmad, T. & Abdulghani, H. M. (2024) The impact of study habits and personal factors on the academic achievement performances of medical students. BMC Medical Education, 24, 888.
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पिछले कुछ दशकों में वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में बदलती चुनौतियों और अवसरों के साथ लगातार विकसित हुई है। यह शोध भारत की बदलती रणनीति का विश्लेषण करता है, जिसमें आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, सीमा विवाद, और ऊर्जा सुरक्षा जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों के साथ-साथ वैश्विक शक्तियों और पड़ोसी देशों के साथ भारत के कूटनीतिक संबंधों की भूमिका को समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन में यह दर्शाया गया है कि भारत की विदेश नीति अब केवल परंपरागत राजनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें आर्थिक कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग, बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भागीदारी और तकनीकी क्षमताओं के विकास को भी शामिल किया गया है। शोधपत्र यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि भारत की बदलती रणनीति राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में एक संतुलित और गतिशील दृष्टिकोण अपनाती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, साइबर सुरक्षा, भारत की रणनीति, आतंकवाद, सीमा विवाद.
1. गुप्ता, एस. (2015) भारत की राष्ट्रीय सुरक्षाः चुनौतियाँ और रणनीतियाँ. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली।
Human Rights are inalienable and inherent in every human being before his birth in this universe and remain with him even after the death. The rights which are inalienable and inherent cannot be separated from any human being including the incarcerated women. This article focused on the protection of human rights of incarcerated women those are kept in prison, which is beyond the vicinity of general public. Because the incarcerated women are segregated from the society, there are more chances that the state-controlled prison and the prison administration may hamper on the human rights of incarcerated women. The National Commission tasked not only as a watch dog but also a warrior to protect the rights of incarcerated women.
Human Rights, Incarcerated Women, National Human Rights Commission.
1. Nat’l Human Rights Comm’n, www.nhrc.nic.in. (last visited 01/01/2026)
भारतीय इतिहास में तिरस्कार, मानहानि और धोखा के नाम से प्रसिद्ध 1905 का बंगाल विभाजन राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रथम उत्ताल तरंग था। संयुक्त बंगाल प्रान्त का निर्माण 1773 ई. में किया गया और यह 1905 ई. तक अविभाज्य रहा। 1903 ई. में बंगाल के गवर्नर सर एण्ड्रयू फेजर ने बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव रखा जिसे मूर्तरूप तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने दिया। वस्तुतः बंगाल विभाजन विलियम बार्ड की दिमागी उपज थी। यह विभाजन कांग्रेस की बढ़ती शक्ति को क्षीण करने, राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर बनाने तथा भारत में साम्प्रदायिकता को और अधिक फैलाने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि हिन्दू और मुसलमान आपस में बँट जाएँ और रोमन कहावत ‘बाँटो और राज करो’ का नारा भारत में और अधिक दिनों तक कायम रह सके। कलकत्ता उस समय की राजधानी थी, इसी कारण बंगालियों को पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर सर्वाधिक और सर्वप्रथम मिला। अतः ये राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हो गए और बंगाल पूरे हिन्दुस्तान की राजनैतिक आन्दोलन का केन्द्र बन गया था। परिणामस्वरूप लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रीयता को खंडित करने हेतु मुस्लिम प्रधान पूर्व बंगाल को अलग कर उसे हिन्दूप्रधान शेष बंगाल के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की।1
बंगाल विभाजन, राष्ट्रीय आंदोलन, सम्प्रदायिकता, एसोसिएशन, राष्ट्रीयता, हड़ताल.
1. पाल, बी.सी. (1907) द फ्रीडम मूवमेंट इन बंगाल. न्यू इंडिया प्रेस, कोलकाता, पृ. 46।
सतत् विकास के लिये पर्यावरण जागरूकता का होना अत्यंत आवश्यक है। यह एक ऐसी विकास प्रक्रिया है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है बिना भावी पीढ़ी की जरूरतों किये समझौता किये। पर्यावरण और विकास का संतुलन ही सतत् विकास का मूल आधार है। सतत् विकास के लिये पर्यावरण जागरूकता को इस प्रकार समझा जा सकता है जैसे - प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संसाधनों का उपयोग समझदारी से करना और उन्हें भविष्य के लिये बचाना। सतत् विकास का मुख्य लक्ष्य है प्रदूषण में कमी - उद्योगों के अनियंत्रित विकास से होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं को कम करना, जेैसे कि वायु और जलप्रदूषण को नियंत्रित करना, वायु जल और मृदा प्रदूषण को कम करने के लिये जन जागरूकता (जैसे सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक) अत्यंत आवश्यक है। नवीकरणीय ऊर्जा जिसमें सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाना जो सतत् विकास के लिये जरूरी है। सामुदायिक भागीदारी के अंतर्गत मिशन लाइफ जैसे कार्यक्रमों के माध्यमों से समुदाय को जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और हरित जीवन शैली के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यावरण के लिये संतुलन के लिये अधिक से अधिक पेड़ लगाना और जैव विविधता का संरक्षण करना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी है इसके लिये समाज के हर वर्ग को जागरूक होकर व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रयास करने होगे।
सतत् विकास, पर्यावरण, संरक्षण, ऊर्जा स्रोत, प्रदूषण नियंत्रण, हरित जीवन शैली.
1. गुरूपंच, कुबेर सिंह (2023) पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका. International Journal of Reviews and Research in Social Science, 2(2), 116.
The paper will discuss how failures in corporate governance contribute to corporate misconduct, with particular reference to the current environment on Indian unicorns and world technology companies. Although India has strong legal systems, such as the Companies Act 2013 and the regulations set by the SEBI, there is still a great gap between the law and what companies do in reality. Pushed by a culture of toxic growth at all costs, and in adverse cultures particularly by heavy valuation pressures, start-up businesses often commit financial irregularities, like revenue inflation, and promoter adventurism, as founders steal company money to their own gain. The research based on comparative case studies of Indian startups such as Byju, BharatPe, and BluSmart, as well as global organizations such as Enron, Volkswagen and Facebook, finds universal weaknesses: founder centric cultures, ineffective board oversight, auditors’ negligence and short-term profit obsessions. The paper highlights digital-era compliance challenges driving a shift toward proactive ex-ante regulation like India’s proposed Digital Competition Bill. The results finally indicate that institutional checks result in failure in large part because of insufficient financial experience of independent directors, conflict of interest in the course of auditors and superficial due diligence by the investors. The paper highly suggests reforming the accountability requirements of the independent directors, creating national laws to offer wholesale protection to whistle-blowers, ensuring that regulatory scrutiny is applied to unlisted startups, and fostering a culture of ethical leadership that encourages sustainability over artificial valuations.
Corporate Governance, Corporate Misconduct, Indian Unicorns, Digital Competition Law, Independent Directors.
1. Deloitte Haskins & Sells, Resignation Letter as Auditor for Think and Learn Pvt. Ltd. (Byju’s), June 22, 2023, https://thewire.in/business/deloitte-resigns-as-auditor-for-byjus, Accessed on 18/01/2026.
India’s inflation dynamics remain highly vulnerable to movements in global crude oil prices because the country continues to rely heavily on imported oil. This dependence matters not only for energy use itself, but also because petroleum affects transportation, manufacturing, fertilizers, and other essential inputs that shape overall production costs and household spending. As a result, any sharp increase in international crude prices can spread through the economy quickly. The transmission usually works through several linked channels. First, higher oil prices increase the import bill and worsen external balances. Second, they can put pressure on the rupee, making imports more expensive and adding to domestic inflation. Third, the final effect depends on how far the government allows global prices to pass through to domestic fuel prices, especially when taxes, subsidies, or price-smoothing measures are used. Finally, oil shocks can influence inflation expectations, which may then affect wages and broader price-setting behavior. Evidence from Indian policy research suggests that even with government intervention, oil shocks can still produce a noticeable rise in headline inflation. At the same time, the strength of this pass-through is not fixed. It changes according to exchange rate movements, fiscal responses, and the credibility of monetary policy. Studies also show an important policy dilemma: full pass-through may raise inflation more sharply in the short run, while partial pass-through may reduce immediate price pressure but create costs for the budget and public sector finances. This paper builds a structural framework to examine these relationships and to evaluate alternative policy responses for managing oil-driven inflation in India.
Oil Price Shocks, Exchange Rate Channel, Inflation Pass-through, Import Dependence.
1. Bhanumurthy, N. R.; Das, S. & Bose, S. (2012, March) Oil price shock, pass-through policy and its impact on India (Working Paper No. 2012-99) National Institute of Public Finance and Policy. https://www.nipfp.org.in/media/documents/wp_2012_99.pdf, Accessed on 04/01/2026.