The phenomenon of defensive medicine has emerged as a significant concern at the intersection of healthcare delivery and medical negligence law. The purpose of this study is to critically examine how the fear of litigation influences clinical decision-making and its consequent impact on the quality, accessibility, and efficiency of healthcare services. The methodology adopted in this research is primarily doctrinal and analytical, involving a detailed examination of legal principles governing medical negligence, including the doctrines of duty of care, breach, and causation, along with judicial precedents and secondary sources such as legal commentaries, medical journals, and policy reports. The key findings of the study reveal that the growing apprehension of malpractice litigation compels healthcare professionals to engage in both positive and negative defensive practices. These include over-prescription of diagnostic tests and procedures, excessive reliance on documentation for legal protection, and avoidance of high-risk patients.
Defensive Medicine, Medical Negligence, Fear of Litigation, Duty of Care, Standard of Care, Bolam Principle.
1. The Consumer Protection Act, 2019 (India).
विद्यालय बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास का प्रमुख केंद्र होते हैं किंतु हाल के वर्षों में विद्यालयों में छात्रों के बीच धमकाने, मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा की घटनाएँ बढ़ती हुई देखी गई हैं। ऐसी घटनाएँ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और शैक्षणिक प्रदर्शन पर गंभीर प्रभाव डालती हैं। भारत में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विधिक प्रावधान जैसे Right to Education Act 2009, Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act 2012 तथा Juvenile Justice Act 2015 लागू किए गए हैं। इन कानूनों के अंतर्गत विद्यालय प्रशासन पर यह दायित्व होता है कि वे बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराएँ। यह शोध विद्यालयों की जिम्मेदारियों, विधिक प्रावधानों तथा न्यायिक दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यदि स्कूल प्रशासन उचित निगरानी, जागरूकता कार्यक्रम, काउंसलिंग व्यवस्था और अनुशासनात्मक नीति लागू करे, तो बुलिंग और छात्र हिंसा की घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सकता है।
बुलिंग, स्कूल सुरक्षा, छात्र संरक्षण, बाल अधिकार.
1. भारतीय संविधान
वर्तमान परीक्षा प्रणाली संकुचित व संकीर्ण है। यह विद्यार्थियों के नैतिक स्तर को भी निम्न बनाने के लिए उत्तरदायी है। नैतिक स्तर का मूल्यांकन परीक्षाओं में समाहित न होने की वजह से विद्यार्थी नैतिकता सम्बन्धी बातों में रूचि नहीं रखते। इसका हाानिकारक प्रभाव विद्यार्थियों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। परीक्षा के दौरान छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। अंकन प्रणाली में विश्वसनीयता का अभाव हो गया है। आज मूल्यांकन प्रक्रिया में कितनी पारदर्शिता है ये हम सभी जानते हैं इसलिए आवश्यकता है रचनात्मकता, सहयोग और भावनात्मक बुद्धिमता सहित दक्षताओं की एक विस्तृत श्रंृखला को शामिल करने के लिए छात्र के प्रदर्शन के मूल्यांकन के मानदंडों का विस्तार करें साथ ही वैकल्पिक मूल्यांकन विधियों का प्रयोग करते हुए प्रासंगिक मूल्यांकन की ओर बदलाव को प्रोत्साहित करें। परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में छात्रों के साथ अध्यापकों व अभिभावकों का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्यापकों व अभिभावकों द्वारा सम्पूर्ण आंकलन हमें संकेत देते हैं कि बच्चों के सीखने में कहां कमी रह गई है जिसके आधार पर सीखने में सुधार के लिए उचित समय पर आवश्यक कदम उठाये जा सके।
संकुचित, संकीण, पारदर्शिता, रचनात्मकता, भावनात्मकता बुद्धिमता.
1. अग्रवाल, ईश्वर प्रकाश (2002) अनिताः कार्यक्रम आयोजन. आर्य बुक डिपो, नई दिल्ली।
भारतीय ज्ञान एवं परम्परा में धन को धर्म और आध्यात्म से जोड़ा गया हैं। धन अर्जन की प्रक्रिया में धर्म आधारित व्यवस्था कर नैतिकता को स्थान दिया गया हैं, लेकिन वर्तमान समय में यह विचार कितना प्रासांगिक है इस बात का विश्लेषण यह शोध पत्र करता हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय जन मानस के धन के प्रति सोच में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन किया गया है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों, वेदों एवं उपनिषदों में जो आर्थिक विचार हैं, क्या वह विचार अभी भी लोगों में है? शोध पत्र के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी के लोगों की धन के प्रति क्या सोच है? क्या व्यक्ति आज धन को ही सर्वाेपरि मानता है? प्राचीन भारतीय दर्शन के आर्थिक विचारों का अध्ययन करना साथ ही भारतीय परंपरा और आधुनिक सोच कर तुलनात्मक अध्ययन करना, धन के अर्जन से होने वाली सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्या-क्या परिवर्तन हो रहे हैं उसका अध्ययन करना एवं वर्तमान आर्थिक नीतियों में नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व की कमी का अध्ययन करना इसका उद्देश्य है। यह अध्ययन प्राथमिक समंकों पर आधारित हैं। सूचनादाताओं से विभिन्न जानकारी प्राप्त कर उसका विश्लेषण किया गया हैं। इनमें मुख्य रूप से उच्च शिक्षित वर्ग सम्मिलित है। शोध अध्ययन में पाया कि आज वर्तमान समय में भी व्यक्ति धन को सर्वाेपरि नहीं मानता है। वैदिक और उपनिषद के आर्थिक विचार मौजूद है, लेकिन जीवन यापन और आधुनिक जीवन शैली के दबाव में उसने धन को महत्व देना जरूरी समझते है। वह पुराने धन संबंधी सोच और नए जीवन शैली के तनाव के बीच संघर्ष की स्थिति में है, जहां वह सोच से तो वैदिक है, लेकिन कर्मों में धन की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए धन को महत्व देना उसकी मजबूरी बन रही है।
भारतीय ज्ञान, परंपरा, सामाजिक समानता, धन, आधुनिक सोच एवं आर्थिक नीतियां.
1. अथर्ववेद. अथर्ववेद संहिता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, व्याख्याकार) अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा (काण्ड 3, सूक्त 24, मंत्र 5). 2015.
प्रस्तुत शोध-पत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन में सोशल मीडिया के प्रभावों का कृषक और नौकरीपेशा वर्ग के मध्य तुलनात्मक अध्ययन की विवेचना करता है। डिजिटल क्रांति, इंटरनेट की सुलभता और स्मार्टफोन के व्यापक प्रसार ने शहरी समाज के समानान्तर ग्रामीण समाज की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन किए हैं। कृषक वर्ग के लिए सोशल मीडिया एक सूचना-स्रोत के रूप में उभरा है, जिसके माध्यम से वे कृषि संबंधी नवीन तकनीकों, मौसम पूर्वानुमान, फसल बीमा, मंडी भाव और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इससे उनकी कृषि उत्पादकता और निर्णय प्रक्रिया पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। वहीं दूसरी ओर नौकरीपेशा ग्रामीण वर्ग सोशल मीडिया का उपयोग मुख्यतः रोजगार संबंधी जानकारी, पेशेवर नेटवर्किंग, ऑनलाइन प्रशिक्षण, सूचना अद्यतन और मनोरंजन के लिए कर रहा है। इस वर्ग के लिए सोशल मीडिया कार्य-जीवन संतुलन और सामाजिक पहचान के निर्माण का भी एक माध्यम बन गया है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया ने दोनों वर्गों में सामाजिक सहभागिता और जागरूकता को बढ़ाया है, किंतु इसके प्रभाव समान नहीं हैं। जहां कृषकों के लिए सोशल मीडिया ग्रामीण विकास और कृषि नवाचार का साधन बना है, वहीं नौकरीपेशा वर्ग में यह जीवनशैली, उपभोग प्रवृत्तियों और वैश्विक दृष्टिकोण को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही फेक न्यूज, साइबर धोखाधड़ी, सूचना की अधिकता और डिजिटल साक्षरता की कमी जैसी चुनौतियाँ दोनों वर्गों के लिए समान रूप से विद्यमान हैं। कुल मिलाकर इस शोध से निष्कर्ष निकलता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन में सोशल मीडिया की भूमिका बहुआयामी है और कृषकों तथा नौकरीपेशा वर्ग के सामाजिक-आर्थिक संदर्भों के अनुसार इसके प्रभावों में स्पष्ट भिन्नता पाई जाती है।
सोशल मीडिया, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ग्रामीण जीवन, कृषक, नौकरीपेशा.
1. शर्मा, रमेश कुमार (2016) सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का सामाजिक परिवर्तन पर प्रभाव. भारतीय समाजशास्त्रीय शोध पत्रिका, 8(1), 45-52।
भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। प्राचीन काल में कृषि करना सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। जब वस्तु विनिमय की प्रणाली रही तब तक यह व्यवसाय भी समृद्ध रहा। धीरे-धीरे इस व्यवसाय में भारी बदलाव आते रहे जिसका परिणाम कृषकों पर होता रहा। सबसे पहले जो सार्वजनिक कृषि-भूमि थी वह निजी हो गयी। पीढ़ी दर पीढ़ी वह टुकड़ों में बँटती चली गयी। कृषि पर कर लगाया गया जिसको भरते-भरते कृषक निर्धन होते रहे और इसके परिणामस्वरूप आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गए। आज के उन्नत भारत में भी किसान की स्थिति में उतना बदलाव नहीं आया। कहीं न कहीं इसके लिए संपूर्ण व्यवस्था ही जिम्मेदार है। जो सभी का पेट भरने के लिए दिन रात एक करता है, उसके लिए दो समय का खाना भी नसीब न हो यह दुखद बात है। आज स्त्री विमर्श, किन्नर विमर्श, वृद्ध विमर्श, बाल विमर्श के साथ-साथ किसान विमर्श पर भी लिखा जा रहा है। इससे देशभर के किसानों की स्थिति सामने आ रही है। देश के अनेक राज्यों में अनेक भाषाओं में किसान से संबंधित अनेक समस्याएँ, उनकी पारिवारिक स्थिति, आर्थिक स्थिति से लोग अवगत हो रहे हैं। प्रेमचंद का ‘गोदान’ संजीव जी का ‘फाँस’ वीरेंद्र जैन का ‘डूब’, एस. आर. हरनोट का ‘हिडिम्ब’, राजू शर्मा का ‘हलफ़नामा’ मधु कांकरिया का ‘ढलती साँझ का सूरज़’ आदि उपन्यास किसान जीवन का यथार्थ चित्रण पाठक के सामने रखते हैं। इन सारे उपन्यासों में किसानों का जीवन, उनकी समस्याएँ, शोषण, समाज एवं राजनीति से उपेक्षित, अंधविश्वास, गरीबी, अशिक्षा, प्राकृतिक आपदाएँ, कर्ज़ का बोझ और ऐसी ही अनगिनत समस्याओं से गुजरते हुए इसके अंतिम उपाय के रूप में आत्महत्या तक की यात्रा का चित्रण मिलता है। आर्थिक तंगी से बाज़ आकर आत्महत्या के लिए किसानों का प्रवृत्त होना समाज के लिए कितना खतरनाक है! किसानों की ऐसी स्थिति को देखकर नवयुवक खेती को व्यवसाय के रूप में कैसे अपनाएँगे? ऐसे ही अनगिनत सवाल लेखकों ने अपने साहित्य में उठाए हैं। मधु कांकरिया का उपन्यास ‘ढ़लती साँझ का सूरज’ अपने आप में अनोखा उपन्यास है जिसमें लेखिका किसानों की कई समस्याओं की ओर पाठक का ध्यान खिंचती है और नए युग के निर्माता भारतीय युवकों के द्वारा बहुत कुछ किए जाने की संभावनाओं की ओर दिशा निर्देश करती है।
किसान, आत्महत्या, फ़सल, बीज, शोषण, युवक.
1. कांकरिया, मधु (2024) ढलती साँझ का सूरज़. राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. 19।
आत्म-अभिव्यक्ति का तात्पर्य अपने विचारों एवं अपनी रुचियांे का उपयोग करके अपनी भावनाओं को दूसरों के समक्ष स्पष्ट रूप से व्यक्त करना है। इसमें एक व्यक्ति के रूप में पहचान बनाने की सक्षमता होती है एवं व्यक्ति की अदृश्य आत्म-पहचान का प्रकटीकरण पसंद, विश्वास, राय, लक्षण एवं दृष्टिकोण में प्रदर्शित होता है। स्वस्थ्य रहने हेतु जो व्यक्ति सबसे अच्छा काम कर सकता है वही आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर को भी खोज कर सकता है। विद्यार्थियांे द्वारा अपने संस्थान मंे रणनीतिक प्रयास करने और रणनीतिक सामग्रियों से सकारात्मक व्यवहारों के प्रदर्शन से उनके आत्म-अभिव्यक्ति पर पूर्णतः प्रभाव पड़ता है। यह तो प्रकट करने की एक प्रक्रिया होती है, जो मौखिक लिखित या कलात्मक गुण को प्रकाशित करती है। इसके माध्यम में विद्यार्थी अपने अनुभवों को भाषा, कला, हाव-भाव या अन्य क्रियाकलाप (लेखन, संगीत, नृत्य, चेहरे के भाव) से करते हैं।
आत्म-जागरूकता, सृजनात्मकता, भावनाएँ अंतर्मन, अभिव्यक्ति, स्व-पहचान.
1 हुआर्टा, डी. ला. (2014) आत्म-अभिव्यक्ति की शक्ति, द हफिंगटन पोस्ट. http://www.hffuingtonpost.com, Assessed on 10/01/2026.
भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन क्षेत्र कृषि का पूरक एवं ग्रामीण आय का प्रमुख स्रोत है। भारत विश्व में दुग्ध उत्पादन में अग्रणी है, किंतु प्रति पशु उत्पादकता अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है। छत्तीसगढ़ राज्य, विशेषकर रायपुर जिला, पशुपालन आधारित आजीविका के विस्तार की दृष्टि से उभरता हुआ क्षेत्र है। केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाएँ जैसे राष्ट्रीय गोकुल मिशन, राष्ट्रीय पशुधन मिशन, राष्ट्रीय डेयरी योजना तथा पशुपालन अवसंरचना विकास निधि ने उत्पादकता एवं लाभ वृद्धि के लिए संरचनात्मक आधार प्रदान किया है। प्रस्तुत शोध में रायपुर जिले के संदर्भ में इन योजनाओं के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन द्वितीयक आँकड़ों, जिला पशुपालन कार्यालय रिपोर्टों तथा सहकारी दुग्ध संघों के अभिलेखों पर आधारित है। परिणामों से स्पष्ट है कि दुग्ध संकलन, कृत्रिम गर्भाधान, चारा विकास एवं प्रसंस्करण अवसंरचना में सुधार से आय में वृद्धि हुई है, किंतु तकनीकी प्रशिक्षण, विपणन एकीकरण तथा वित्तीय समावेशन में सुधार की आवश्यकता है।
पशुधन उत्पादकता, रायपुर, छत्तीसगढ़, दुग्ध उत्पादन, सरकारी योजनाएँ, ग्रामीण आय.
1. 20th Livestock CensusChhattisgarh State District-wise Livestock population 2019-20, https://agriportal.cg.nic.in/ahd/PDF_common/census20th/2_Districtwise_Animal_population_ 20th_LSC.pdf, Accessed on 10/01/2026.
विधान को अंग्रेजी भाषा में लेजिस्लेशन कहते हैं जो स्वयं और लेशियो नामक दो लैटिन शब्दों के योग से बना है। लैटिन भाषा में लेजिस शब्द का अर्थ है विधि तथा लेशियो का अर्थ है अतः विधान का शाब्दिक अर्थ है विधि की प्रस्थापना या निर्माण करना। विधि-निर्माण में विधान को सबसे प्रबल, प्रमुख एवं आधिकारिक स्त्रोत माना गया है क्योंकि इसे प्राचीन विधियों को निरसित करने तथा वर्तमान विधियों में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है। विधान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए रास्को पाउंड ने कहा है कि विधि के तीन प्रमुख प्रयोजन हैं-(1) समाज में स्थिरता लाना (2) समाज के प्रत्येक व्यक्ति की अधिकतम स्वाधीनता सुनिश्चित करना, तथा (3) मानव की अधिकतम संतुष्टि। उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विधि के निश्चित नियमों की आवश्यकता हुई जिससे न्याय प्रशासन सुगमतापूर्वक संचालित हो सके। प्राचीन काल में जब विधान जैसी कोई विधि-निर्मात्री शक्ति अस्तित्व में नहीं थी, उस समय प्रथाएँ तथा प्राकृतिक विधि या दैवी विधि के नियमों के आधार पर न्याय व्यवस्था संचालित होती थी, परन्तु समाज के विकास एवं प्रगति के साथ-साथ यह अनुभव होने लगा कि प्रथाएँ तथा प्राकृतिक या दैवी नियम समाज में न्याय व्यवस्था कायम रखने के लिए अपर्याप्त हैं, क्योंकि इन्हें विधि का रूप ग्रहण करने में पर्याप्त समय लगता है। जब तक कोई प्रथा विधि का नियम बन पाये तब तक सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार नई प्रथाएँ जन्म लेती हैं। अतः इस कमी को दूर करने के लिए विधान की आवश्यकता प्रतीत होती है। विधान एक ऐसा साधन है जो प्रथाओं तथा सामाजिक आवश्यकताओं या लोकमत के बीच के रिक्त स्थान की पूति करता है।
विधान निर्माण, डिजिटल, संहिताकरण, सैविग्नी, समाज.
1. परान्जपे, एन.वी. (2019) विधि शास्त्र तथा विधि का सिद्धांत. सेंट्रल लॉ एजेंसी, मोतीलाल नेहरू रोड, प्रयागराज, आईएसबीएन 978-81-941659-3-4।
A comparative study was carried out to evaluate the influence of organic and conventional nutrient management systems on leaf and fruit nutrient composition of apple (Malus domestica Borkh.) cv. Red Delicious grown in Pulwama district, Kashmir Valley. Apple orchards under two distinct management regimes organic (using FYM and bio fertilizers) and conventional (using chemical fertilizers) were analysed for macronutrient (N, P, K, Ca, Mg) and micronutrient (Fe, Zn, Cu, Mn) contents in leaves and fruits. The organically managed orchards exhibited higher levels of calcium, magnesium, potassium, and micronutrients (Zn, Mn, Cu), while conventionally managed orchards showed higher nitrogen and phosphorus concentrations. Organic nutrient management also improved fruit quality attributes by enhancing nutrient balance and reducing heavy metal accumulation. The results highlight the potential of organic systems for sustainable apple production and improved fruit nutritional value in the Himalayan region.
Apple Nutrition, Organic Management, Conventional Farming, Leaf Nutrients, Fruit Quality, Kashmir Valley.
1. Ahmad, S. (2003) Characterization and nutrient indexing of apple (Malus domestica Borkh.) Orchard soils of Bangil area of district Baramulla. M. Sc thesis submitted to Sher-e-Kashmir, University of Agricultural Sciences and Technology of Kashmir, Srinagar, Jammu and Kashmir, p. 104.
The women’s education landscape in India is a deep mirror to the country’s overall socio-political development, marking a transition from ancient inclusivity to entrenched marginalization and, finally, a struggle for reclaiming it over the past century. This trajectory is not just a historical timeline of literacy percentages but a multifaceted tale of power, resistance, and transformation. The National Education Policy (NEP) 2020 comes at a pivotal point in this journey, trying to shatter the age-old impediments that have existed for millennia. Through the incorporation of gender as a horizontal agenda and the recognition of the intersectionality of caste, religion, and geography, NEP 2020 aims to convert the entire education system from an elitist tool to a tool of universal emancipation. To grasp the revolutionary possibilities of modern policies, it is imperative to examine the historical roots of educational exclusion and the revolutionary struggles that made way for modern-day reforms.1
Architecture, Women, Education, Strategic Interventions, NEP 2020.
1. Devi, Rameshwari & Pruthi, Romila (eds.) (1998) Women and the Indian Freedom Struggle: Annie Besant. Pointer Publishers, Jaipur.
अंग्रेजों के शिक्षा-प्रणाली के विरुद्ध राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली के समर्थक में स्वामी विवेकानन्द का नाम प्रमुख है। ज्ञान क्या है, इसमें प्राचीन भारतीय और आधुनिक पाश्चात्य मत में स्पष्ट विभिन्नता प्रतीत होता है, किन्तु मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति तभी होती है जब उसे भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान हो। प्राचीन भारतीय शिक्षा के अनुसार ज्ञान व्यक्ति के भीतर उत्पन्न होता है, बाह्य वातावरण के प्रभाव से नहीं। ज्ञान का स्रोत हमारे भीतर है तो व्यक्ति शिक्षा स्वयं से भी प्राप्त किया जा सकता है। विवेकानन्द के अनुसार “जिस तरह आप एक पौधा नहीं उगा सकते, उसी तरह आप किसी बालक को शिक्षा नहीं दे सकते।” शिक्षक का कार्य बालक के मार्ग में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने में सहयोग करना है। बालक को उन्मुक्त रखना चाहिए, अनावश्यक माता-पिता या शिक्षक को दबाव नहीं देना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार बालक को विकसित होने का उचित अवसर देना चाहिए। वेदांत दर्शन के सार्वभौमिक सिद्धांत और मानवतावादी शिक्षा वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक और लाभदायक है। नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा के अभाव के कारण ही युवक-युवतियों का चरित्र पतन हो रहा है इसलिए जन-स्त्री, व्यावसायिक, धार्मिक और राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में उचित मार्ग प्रशस्त करने को प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता है। वर्तमान परिस्थितियों के लिए भी स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक-विचार, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए दिशा-निर्देश उचित हैं। स्वामी विवेकानन्द दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, शिक्षा-शास्त्री, समाज-सेवी और दूरदृष्टि की प्रवृति रखते थे, उनका दर्शन समग्र विकास पर केंद्रित था। स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक विचारों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी विद्यार्थियों के विकास में अहम् भूमिका है।
स्वामी विवेकानन्द, शिक्षक, राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली, समाज.
1. कपूर, कारबानू (2024) स्वामी विवेकानन्द का साहित्यक व्यक्तित्व, प्रलेख प्रकाशन, उत्तर प्रदेश।
बाल शोषण आधुनिक समाज की एक गंभीर समस्या है, जो बच्चों के शारीरिक, मानसिक, यौन एवं सामाजिक विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। भारत में इस समस्या के समाधान हेतु विभिन्न विधिक प्रावधान जैसे POCSO Act 2012, Juvenile Justice Act 2015 तथा Right to Education Act 2009 लागू किए गए हैं। इस शोध-पत्र का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में स्थानीय अधिकारियों की क्या भूमिका और जिम्मेदारियाँ हैं। अध्ययन में यह पाया गया है कि स्थानीय प्रशासन जैसे पुलिस, जिला प्रशासन, बाल कल्याण समिति आदि बाल संरक्षण प्रणाली के प्रमुख स्तंभ हैं। यह शोध गुणात्मक विधि पर आधारित है, जिसमें विधिक प्रावधानों, न्यायालयीन निर्णयों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया गया है। शोध से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि स्थानीय अधिकारी अपने कर्तव्यों का प्रभावी और संवेदनशील तरीके से पालन करें, तो बाल शोषण की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। बाल शोषण एक गंभीर सामाजिक और कानूनी समस्या है, जिसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक, यौन एवं आर्थिक शोषण शामिल होते हैं। इसकी रोकथाम में स्थानीय अधिकारियों (जैसे जिला प्रशासन, पुलिस, बाल कल्याण समिति, सामाजिक कार्यकर्ता आदि) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
बाल शोषण, स्थानीय प्रशासन, बाल अधिकार, POCSO Act.
1. भारतीय संविधान।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ईरान-अमेरिका-इजराइल के मध्य बढ़ता हुआ तनाव एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संकट के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और वाणिज्यिक गतिविधियों को गहराई से प्रभावित कर रहा है। इस अध्ययन का उद्देश्य इस संघर्ष के कारण उत्पन्न आर्थिक प्रभावोंकृविशेष रूप से तेल कीमतों में वृद्धि, ऊर्जा संकट, मुद्रास्फीति, तथा वैश्विक व्यापार में व्यवधान का विश्लेषण करना है। यह शोध मुख्यतः द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स, आर्थिक जर्नल्स, तथा विभिन्न शोध अध्ययनों का उपयोग किया गया है। अध्ययन में यह पाया गया कि भू-राजनीतिक संघर्ष का सीधा प्रभाव ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत और परिवहन व्यय में वृद्धि होती है तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप महंगाई बढ़ती है और वाणिज्यिक गतिविधियाँ धीमी पड़ जाती हैं, जिसका प्रभाव विशेष रूप से विकासशील देशों पर अधिक होता है। इसके साथ ही, यह शोध भारतीय ज्ञान प्रणाली के सिद्धांतों जैसे आत्मनिर्भरता, नैतिक व्यापार, संतुलित उपभोग, और वैश्विक सहयोग को आधुनिक आर्थिक संकट के समाधान के रूप में प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित सिद्धांत वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि आधुनिक वैश्विक वाणिज्य अत्यधिक परस्पर निर्भर और संवेदनशील है, जिसके कारण किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ता है। अतः यह आवश्यक है कि वैश्विक आर्थिक नीतियों में भारतीय ज्ञान प्रणाली के सिद्धांतों को समाहित किया जाए, जिससे एक संतुलित, नैतिक और स्थायी आर्थिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सके।
भू-राजनीतिक संघर्ष, वैश्विक व्यापार, तेल कीमतें, मुद्रास्फीति, भारतीय ज्ञान प्रणाली, सतत् वाणिज्य.
1. कौटिल्य (2019) अर्थशास्त्र. अनुवादः एल. एन. रंगराजन, पेंगुइन क्लासिक्स, नई दिल्ली, पृ. 45-60, 120-135।
हिन्दी उपन्यास की परंपरा में मनोहर श्याम जोशी का प्रवेश एक ऐसे रचनाकार के रूप में होता है, जिसने कथा-साहित्य को केवल सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर, उसे मानव-मन की जटिल संरचना, आंतरिक द्वंद्व तथा संबंधों की मनोवैज्ञानिक उलझनों से जोड़ा। उनका उपन्यास-जगत वस्तुतः उस मध्यवर्गीय जीवन का दर्पण है, जहाँ बाह्य घटनाओं से अधिक महत्वपूर्ण मन के भीतर घटित होने वाली प्रक्रियाएँ होती हैं। मनोहर श्याम जोशी ऐसे उपन्यासकार हैं जिनके यहाँ कथा का विकास किसी नाटकीय घटना-क्रम से नहीं, बल्कि चेतना की सूक्ष्म गतियों, स्मृति, अवसाद, कुंठा, आकांक्षा और असफलता-बोध से होता है। इस दृष्टि से उनका उपन्यास-जगत पारंपरिक कथानक-प्रधान उपन्यासों से भिन्न और आधुनिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास की परंपरा से अधिक समीप है। मनोहर श्याम जोशी का रचनात्मक विकास पत्रकारिता, नाटक और टेलीविजन लेखन के माध्यम से हुआ। इस बहुआयामी अनुभव ने उनके उपन्यासों को एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान की। पत्रकारिता ने उन्हें समाज की विसंगतियों से जोड़ा, जबकि नाट्य और टेलीविजन लेखन ने संवाद, चरित्र-चित्रण तथा मनोवैज्ञानिक तनाव को उभारने की क्षमता प्रदान की। उनके उपन्यासों में संवाद केवल कथोपकथन नहीं रह जाते, बल्कि पात्रों की मानसिक अवस्था, असंतोष, दुविधा और आत्मसंघर्ष को उद्घाटित करने का माध्यम बनते हैं। यही कारण है कि जोशी के पात्र बाहरी क्रियाओं से कम और आंतरिक प्रतिक्रियाओं से अधिक पहचाने जाते हैं।
मनोविज्ञान, साहित्य, मनोहर श्याम जोशी, मध्यवर्ग, संस्कृति, पत्रकारिता.
1. सिंह, नामवर (2002) आधुनिक हिन्दी उपन्यास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
The rapid development of Artificial Intelligence (AI) has transformed various aspects of human life, including communication, governance, education, and economy. While AI is often associated with modern technological advancement, its philosophical and ethical dimensions resonate with ancient knowledge systems. Bharatiya Gyan Parampara (Indian Knowledge Tradition) represents a rich intellectual heritage rooted in philosophical inquiry, ethical reflection, and holistic understanding of knowledge. This paper examines the relationship between Bharatiya Gyan Parampara and Artificial Intelligence from a sociological perspective. It explores how traditional Indian epistemology, ethics, and holistic thinking can contribute to contemporary debates on AI development, governance, and ethical use. The study argues that integrating the principles of Indian knowledge traditions such as interconnectedness, ethical responsibility, and knowledge as a tool for social welfare can provide a culturally rooted framework for responsible AI development in India and beyond.
Bharatiya Gyan Parampara, Artificial Intelligence, Sociology.
1. NITI Aayog (2018) National Strategy for Artificial Intelligence – AI for All. NITI Aayog, New Delhi.
Indian Muntjac, Muntiacus muntjak (Zimmerman 1780) is a species under cervidae family, naturally found in the forested regions of south and south-east Asia. To understand their behaviour, a study was made on the Muntiacus muntjak inthe captivity of Jawaharlal Nehru Biological Park, Bokaro, Jharkhand in different season using Scan Sampling Method. It was observed that barking deer spent 52.37 percent of time in activity while rest of time they were in resting during the diurnal hours. Among the daily activities, 20.63% of time spent in movement, followed by 12.10% of time in scanning, 11.11% time in feeding and rest 8.53% time spent in other activities mainly the social activities. The seasonal activity pattern of both male and female Indian Muntjac shows that resting is the dominant behavior, ranging from about 35% to 52% across seasons. Feeding and movement activities are moderate, varying between approximately 10%–20% and 14%–20%, respectively. Scanning behavior remains relatively low (about 6%–14%) but shows a slight increase during winter, especially in females. Social activity is minimal in both sexes, ranging from nearly 5% to 11% with little seasonal variation. Overall, these patterns indicate seasonal influence on activity distribution under captive conditions at Jawaharlal Nehru Biological Park. The study revealed that barking deer in the captivity get equal habitat type, food supply and security from the predators, they have difference in their behaviour, mainly on basic activities. The variation in basic activities might be due to their difference in morphology, size, sex, age, etc.
Barking Deer, Muntiacus, Captivity, Behaviour, Bokaro.
1. Aktar, M.; Ahammed, R.; Khan, M.M.H.; Kabir, M. (2015) Preliminary Findings on Behavioral Patterns of The Barking Deer, Muntiacus muntjak (Zimmermann 1780) In Captivity at Dhaka Zoo in Bangladesh. J. Asiat. Soc. Bangladesh, Sci., 41, 233–243, doi:10.3329/jasbs.v41i2.46207.
भारतीय काव्यशास्त्र में रसों का स्थान सर्वाेपरि है। रस ही वह तत्व है जो काव्य को प्राणत्व प्रदान करता है। आचार्य भरतमुनी से लेकर आधुनिक आचार्याे ने रस को काव्य का आत्मतत्व माना है। मानवीय संवेदनाओं में रसों के ब्रम्हबीज निहित होते हैं। कवि अपने भावाभिव्यक्ति में किसी रस को लक्ष्य करके कोई सृजन नही करता अपितु समसमायिक घटनाक्रम ही रसों को जन्म देती है। रसों की निष्पत्ति लोकपरंपरा तथा लोकाचार की समसमायिक भावों से होती है। लोकसंस्कृति में काव्य एवं परंपरा मनुष्य के प्रारंभिक जीवन से प्रतिछाया की तरह आज भी साथ चल रही है। ऐसे ही अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपरा एवं साहित्यिक क्षेत्रों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश के साहित्यकारों ने अपने काव्यकृतियों में रसाभिव्यक्ति से काव्य को सुंदर एवं सहज बनाया है। लोकभाषा में रचे काव्य में रस, परंपरा, लोकजीवन, लोकसाहित्य, प्रकृति प्रेम एवं धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र में रस का स्थान महत्वपूर्ण है, जो लोकसाहित्य को पूर्णता प्रदान करती है।
रस, लोकसाहित्य, काव्य, छत्तीसगढ़ी काव्य, रसाभिव्यक्ति.
1. पाण्डेय,सरस्वती गोविन्द (2017) हिन्दी भाषा एवं साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास. अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 405।
This Paper explores the role of financial literacy in enhancing women’s empowerment in the context of Sustainable Development Goals (SDGs) in Bihar. Financial literacy equips women with the ability to manage financial resources effectively, make informed decisions, and improve their socio-economic status. It plays a significant role in achieving several SDGs, such as poverty reduction, gender equality, quality education, and inclusive economic growth. Despite various initiatives aimed at promoting financial inclusion, a large number of women in Bihar continue to face challenges in accessing and effectively utilizing financial services. The study is based on secondary data collected from government reports and academic sources, and it analyzes how financial knowledge contributes to women’s independence and economic stability. The findings indicate that financially literate women are more confident, self-reliant, and economically secure, which ultimately leads to an improved standard of living and broader community development. The study concludes that strengthening financial literacy among women is crucial for achieving sustainable empowerment and long-term development in Bihar.
Financial Literacy, Women’s Empowerment, Sustainable Development Goals, Financial Inclusion, Socio-Economic Development.
1. Arofah, A. A. & Maharani, D. A. (2021) Demographic, financial literacy, and financial behavior of women working in manufacturing industry. Economic Education Analysis Journal, 10(3), 381–393. https://doi.org/10.15294/eeaj.v10i3.46907
किशोरावस्था मानव विकास का एक संवेदनशील चरण है, जिसमें विद्यार्थियों में सामाजिक, भावनात्मक और संज्ञानात्मक परिवर्तनों की तीव्रता बढ़ जाती है। इस शोध का उद्देश्य किशोर विद्यार्थियों में सामाजिक परिपक्वता और संवेगात्मक बुद्धि के बीच विद्यमान संबंध का अध्ययन करना था। अध्ययन हेतु महासमुन्द जिले के 200 विद्यार्थियों (100 छात्र और 100 छात्राएँ) का यादृच्छिक रूप से चयन किया गया। सामाजिक परिपक्वता मापन हेतु नलिनी राव (2018) की सामाजिक परिपक्वता मापनी तथा संवेगात्मक बुद्धि मापन हेतु सरकार एवं सरकार द्वारा निर्मित मापनी का प्रयोग किया गया। प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण SPSS (v-28.0.0) के माध्यम से सहसंबंध पद्धति द्वारा किया गया। विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि सामाजिक परिपक्वता का मध्यमान 242.38 तथा संवेगात्मक बुद्धि का मध्यमान 193.74 है। सहसंबंध गुणांक r = 0.51 प्राप्त हुआ, जो .05 के सार्थकता स्तर पर महत्वपूर्ण है। यह परिणाम संकेत करता है कि सामाजिक परिपक्वता और संवेगात्मक बुद्धि के बीच मध्यम एवं सकारात्मक संबंध मौजूद है। इससे स्पष्ट होता है कि जिन किशोरों की सामाजिक परिपक्वता अधिक होती है, वे भावनात्मक परिस्थितियों को अधिक प्रभावी ढंग से समझते, संभालते और नियंत्रित करते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष शिक्षा, नीति, परामर्श कार्यक्रमों तथा विद्यालयी जीवन-कौशल शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करते हैं। यह शोध किशोर विद्यार्थियों के समग्र विकास में सामाजिक एवं भावनात्मक कौशलों की अनिवार्यता को रेखांकित करता है तथा भविष्य में व्यापक नमूने और विविध सामाजिक समूहों पर आधारित अनुसंधान की आवश्यकता को भी इंगित करता है।
सामाजिक परिपक्वता, संवेगात्मक बुद्धि, किशोरावस्था, सहसंबंध, व्यक्तित्व विकास
1. Bika, S. L. (2021) Understanding adolescent students’ emotional intelligence and adjustment. International Journal of Creative Research Thoughts, 9(8), 552–555.
वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक शैक्षिक वातावरण में विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों में अध्ययन आदतें प्रमुख भूमिका निभाती हैं। प्रभावी अध्ययन आदतें न केवल सीखने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाती हैं, बल्कि विद्यार्थियों के आत्म-अनुशासन, समय-प्रबंधन और अकादमिक प्रदर्शन को भी सुदृढ़ करती हैं। प्रस्तुत विश्लेषणात्मक अध्ययन का उद्देश्य विद्यार्थियों की अध्ययन आदतों और उनकी शैक्षिक उपलब्धि के मध्य संबंध की जाँच करना था। अध्ययन में धरसीवा विकासखंड के 100 उच्चतर माध्यमिक विद्यार्थियों (50 छात्र एवं 50 छात्राएँ) को यादृच्छिक विधि से चुना गया। अध्ययन आदतों के मापन हेतु मुखोपाध्याय एवं सनसनवाल (1985) द्वारा विकसित अध्ययन आदत मापनी तथा शैक्षिक उपलब्धि के लिए कक्षा 10वीं के वार्षिक परीक्षा के प्राप्तांक लिए गए। सांख्यिकीय विश्लेषण हेतु SPSS (Version 28.0.0) में सहसंबंध तकनीक का उपयोग किया गया। विश्लेषण के अनुसार अध्ययन आदतों का मध्यमान 16.74 तथा शैक्षिक उपलब्धि का मध्यमान 60.59 था। दोनों चरों के मध्य सहसंबंध गुणांक त = 0.86 प्राप्त हुआ, जो .05 स्तर पर अत्यधिक सार्थक पाया गया। परिणामों ने स्पष्ट किया कि सुव्यवस्थित और सकारात्मक अध्ययन आदतें विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाती हैं। यह अध्ययन शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षादृनीति निर्माताओं के लिए यह संकेत देता है कि अध्ययन आदतों के विकास हेतु प्रशिक्षण एवं अनुकूल शिक्षण वातावरण उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है, ताकि विद्यार्थियों की शैक्षणिक सफलता को मजबूत आधार मिल सके।
अध्ययन आदतें, शैक्षिक उपलब्धि, सहसंबंध, समय-प्रबंधन, सीखने की रणनीतियाँ.
1. Aljaffer, M. A.; Almadani, A. H.; AlDughaither, A. S.; Basfar, A. A.; AlGhadir, S. M.; AlGhamdi, Y. A.; AlHubaysh, B. N.; AlMayouf, O. A.; AlGhamdi, S. A.; Ahmad, T. & Abdulghani, H. M. (2024) The impact of study habits and personal factors on the academic achievement performances of medical students. BMC Medical Education, 24, 888.
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पिछले कुछ दशकों में वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में बदलती चुनौतियों और अवसरों के साथ लगातार विकसित हुई है। यह शोध भारत की बदलती रणनीति का विश्लेषण करता है, जिसमें आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, सीमा विवाद, और ऊर्जा सुरक्षा जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों के साथ-साथ वैश्विक शक्तियों और पड़ोसी देशों के साथ भारत के कूटनीतिक संबंधों की भूमिका को समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन में यह दर्शाया गया है कि भारत की विदेश नीति अब केवल परंपरागत राजनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें आर्थिक कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग, बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भागीदारी और तकनीकी क्षमताओं के विकास को भी शामिल किया गया है। शोधपत्र यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि भारत की बदलती रणनीति राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में एक संतुलित और गतिशील दृष्टिकोण अपनाती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, साइबर सुरक्षा, भारत की रणनीति, आतंकवाद, सीमा विवाद.
1. गुप्ता, एस. (2015) भारत की राष्ट्रीय सुरक्षाः चुनौतियाँ और रणनीतियाँ. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली।
Human Rights are inalienable and inherent in every human being before his birth in this universe and remain with him even after the death. The rights which are inalienable and inherent cannot be separated from any human being including the incarcerated women. This article focused on the protection of human rights of incarcerated women those are kept in prison, which is beyond the vicinity of general public. Because the incarcerated women are segregated from the society, there are more chances that the state-controlled prison and the prison administration may hamper on the human rights of incarcerated women. The National Commission tasked not only as a watch dog but also a warrior to protect the rights of incarcerated women.
Human Rights, Incarcerated Women, National Human Rights Commission.
1. Nat’l Human Rights Comm’n, www.nhrc.nic.in. (last visited 01/01/2026)
भारतीय इतिहास में तिरस्कार, मानहानि और धोखा के नाम से प्रसिद्ध 1905 का बंगाल विभाजन राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रथम उत्ताल तरंग था। संयुक्त बंगाल प्रान्त का निर्माण 1773 ई. में किया गया और यह 1905 ई. तक अविभाज्य रहा। 1903 ई. में बंगाल के गवर्नर सर एण्ड्रयू फेजर ने बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव रखा जिसे मूर्तरूप तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने दिया। वस्तुतः बंगाल विभाजन विलियम बार्ड की दिमागी उपज थी। यह विभाजन कांग्रेस की बढ़ती शक्ति को क्षीण करने, राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर बनाने तथा भारत में साम्प्रदायिकता को और अधिक फैलाने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि हिन्दू और मुसलमान आपस में बँट जाएँ और रोमन कहावत ‘बाँटो और राज करो’ का नारा भारत में और अधिक दिनों तक कायम रह सके। कलकत्ता उस समय की राजधानी थी, इसी कारण बंगालियों को पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर सर्वाधिक और सर्वप्रथम मिला। अतः ये राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हो गए और बंगाल पूरे हिन्दुस्तान की राजनैतिक आन्दोलन का केन्द्र बन गया था। परिणामस्वरूप लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रीयता को खंडित करने हेतु मुस्लिम प्रधान पूर्व बंगाल को अलग कर उसे हिन्दूप्रधान शेष बंगाल के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की।1
बंगाल विभाजन, राष्ट्रीय आंदोलन, सम्प्रदायिकता, एसोसिएशन, राष्ट्रीयता, हड़ताल.
1. पाल, बी.सी. (1907) द फ्रीडम मूवमेंट इन बंगाल. न्यू इंडिया प्रेस, कोलकाता, पृ. 46।
सतत् विकास के लिये पर्यावरण जागरूकता का होना अत्यंत आवश्यक है। यह एक ऐसी विकास प्रक्रिया है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है बिना भावी पीढ़ी की जरूरतों किये समझौता किये। पर्यावरण और विकास का संतुलन ही सतत् विकास का मूल आधार है। सतत् विकास के लिये पर्यावरण जागरूकता को इस प्रकार समझा जा सकता है जैसे - प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संसाधनों का उपयोग समझदारी से करना और उन्हें भविष्य के लिये बचाना। सतत् विकास का मुख्य लक्ष्य है प्रदूषण में कमी - उद्योगों के अनियंत्रित विकास से होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं को कम करना, जेैसे कि वायु और जलप्रदूषण को नियंत्रित करना, वायु जल और मृदा प्रदूषण को कम करने के लिये जन जागरूकता (जैसे सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक) अत्यंत आवश्यक है। नवीकरणीय ऊर्जा जिसमें सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाना जो सतत् विकास के लिये जरूरी है। सामुदायिक भागीदारी के अंतर्गत मिशन लाइफ जैसे कार्यक्रमों के माध्यमों से समुदाय को जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और हरित जीवन शैली के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यावरण के लिये संतुलन के लिये अधिक से अधिक पेड़ लगाना और जैव विविधता का संरक्षण करना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी है इसके लिये समाज के हर वर्ग को जागरूक होकर व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रयास करने होगे।
सतत् विकास, पर्यावरण, संरक्षण, ऊर्जा स्रोत, प्रदूषण नियंत्रण, हरित जीवन शैली.
1. गुरूपंच, कुबेर सिंह (2023) पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका. International Journal of Reviews and Research in Social Science, 2(2), 116.
The paper will discuss how failures in corporate governance contribute to corporate misconduct, with particular reference to the current environment on Indian unicorns and world technology companies. Although India has strong legal systems, such as the Companies Act 2013 and the regulations set by the SEBI, there is still a great gap between the law and what companies do in reality. Pushed by a culture of toxic growth at all costs, and in adverse cultures particularly by heavy valuation pressures, start-up businesses often commit financial irregularities, like revenue inflation, and promoter adventurism, as founders steal company money to their own gain. The research based on comparative case studies of Indian startups such as Byju, BharatPe, and BluSmart, as well as global organizations such as Enron, Volkswagen and Facebook, finds universal weaknesses: founder centric cultures, ineffective board oversight, auditors’ negligence and short-term profit obsessions. The paper highlights digital-era compliance challenges driving a shift toward proactive ex-ante regulation like India’s proposed Digital Competition Bill. The results finally indicate that institutional checks result in failure in large part because of insufficient financial experience of independent directors, conflict of interest in the course of auditors and superficial due diligence by the investors. The paper highly suggests reforming the accountability requirements of the independent directors, creating national laws to offer wholesale protection to whistle-blowers, ensuring that regulatory scrutiny is applied to unlisted startups, and fostering a culture of ethical leadership that encourages sustainability over artificial valuations.
Corporate Governance, Corporate Misconduct, Indian Unicorns, Digital Competition Law, Independent Directors.
1. Deloitte Haskins & Sells, Resignation Letter as Auditor for Think and Learn Pvt. Ltd. (Byju’s), June 22, 2023, https://thewire.in/business/deloitte-resigns-as-auditor-for-byjus, Accessed on 18/01/2026.
India’s inflation dynamics remain highly vulnerable to movements in global crude oil prices because the country continues to rely heavily on imported oil. This dependence matters not only for energy use itself, but also because petroleum affects transportation, manufacturing, fertilizers, and other essential inputs that shape overall production costs and household spending. As a result, any sharp increase in international crude prices can spread through the economy quickly. The transmission usually works through several linked channels. First, higher oil prices increase the import bill and worsen external balances. Second, they can put pressure on the rupee, making imports more expensive and adding to domestic inflation. Third, the final effect depends on how far the government allows global prices to pass through to domestic fuel prices, especially when taxes, subsidies, or price-smoothing measures are used. Finally, oil shocks can influence inflation expectations, which may then affect wages and broader price-setting behavior. Evidence from Indian policy research suggests that even with government intervention, oil shocks can still produce a noticeable rise in headline inflation. At the same time, the strength of this pass-through is not fixed. It changes according to exchange rate movements, fiscal responses, and the credibility of monetary policy. Studies also show an important policy dilemma: full pass-through may raise inflation more sharply in the short run, while partial pass-through may reduce immediate price pressure but create costs for the budget and public sector finances. This paper builds a structural framework to examine these relationships and to evaluate alternative policy responses for managing oil-driven inflation in India.
Oil Price Shocks, Exchange Rate Channel, Inflation Pass-through, Import Dependence.
1. Bhanumurthy, N. R.; Das, S. & Bose, S. (2012, March) Oil price shock, pass-through policy and its impact on India (Working Paper No. 2012-99) National Institute of Public Finance and Policy. https://www.nipfp.org.in/media/documents/wp_2012_99.pdf, Accessed on 04/01/2026.